ममता का किला ढहा: TMC के 20 सांसदों का NDA को समर्थन, स्पीकर को सौंपा पत्र
बंगाल में दीदी को महाझटका: काकोली दस्तीदार और सुखेंदु शेखर जैसे कद्दावर नेताओं की अगुवाई में हुए इस दलबदल ने ममता बनर्जी को अब तक का सबसे बड़ा झटका दिया है। बागी नेताओं का आरोप है कि वे पार्टी के भीतर तानाशाही रवैये और 'भतीजा राज' से परेशान थे। बंगाल में भी 80 में से 58 विधायक पहले ही ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग हो चुके हैं जिससे अब टीएमसी के वजूद पर ही खतरा मंडराने लगा है….
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस का किला ताश के पत्तों की तरह ढह रहा है। कोलकाता से शुरू हुई बगावत की यह आग अब देश की संसद तक पहुंच गई है, जिसने ममता बनर्जी को उनके राजनीतिक जीवन का सबसे घातक झटका दिया है। टीएमसी के करीब 20 लोकसभा और राज्यसभा सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया है। सुखेंदु शेखर रॉय और काकोली घोष दस्तीदार जैसे कद्दावर चेहरों की अगुवाई में हुआ यह विद्रोह तृणमूल के संसदीय कुनबे में मची बड़ी भगदड़ को साफ बयां करता है।
सांसदों का यह धड़ा दरअसल पार्टी के भीतर लंबे समय से जारी ‘भतीजा राज’ और तानाशाही रवैये से बुरी तरह घुटन महसूस कर रहा था। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस असंतोष में घी का काम किया, जिससे सांसदों को अपना राजनीतिक भविष्य ममता बनर्जी के बजाय एनडीए के साथ सुरक्षित दिखने लगा। दलबदल कानून की कड़े कानूनी शिकंजे से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने बेहद सोची-समझी रणनीति के तहत एक साथ सामूहिक रूप से अलग गुट बनाकर एनडीए को अपना समर्थन सौंपा है।
यह संकट केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल की धरती पर भी तृणमूल पूरी तरह बिखर चुकी है। राज्य में पार्टी के 80 में से 58 से अधिक विधायकों ने पहले ही बगावत का झंडा बुलंद करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया है। राज्यसभा और पार्टी से इस्तीफा देने के बाद सुखेंदु शेखर के तीखे बयानों ने साफ कर दिया कि शीर्ष नेतृत्व सत्ता के अहंकार में डूबा हुआ था। बगावत के इस दौर ने यह साबित कर दिया है कि ममता बनर्जी का क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में दबदबा अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है और टीएमसी अपने वजूद की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है।