Jind-Sonipat Route से भारत की ‘हरित रेल क्रांति’ का आगाज

भारतीय रेल में ऐतिहासिक शुरुआत: Hariyana के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने PM Modi के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि राज्य रेल इंफ्रास्ट्रक्चर में नए रिकॉर्ड बना रहा है। उनके अनुसार, यह हाइड्रोजन डेमू ट्रेन भविष्य के इको-फ्रेंडली पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए एक नया बेंचमार्क (मानदंड) बनेगी और देश के लिए मील का पत्थर साबित होगी…

चाणक्य मंत्र ब्यूरो, चंडीगढ़/ नई दिल्ली।  

भारतीय रेलवे ने देश की पहली हाइड्रोजन-संचालित (Hydrogen-powered) डेमू (DEMU) ट्रेन को हरी झंडी देकर हरित परिवहन (Green Transport) के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। रेल मंत्रालय और रेलवे बोर्ड द्वारा हाल ही में जारी आधिकारिक मंजूरी के बाद उत्तर रेलवे के दिल्ली डिवीजन के अंतर्गत जींद-सोनीपत सेक्शन पर इस 10 कोच वाली ट्रेन का व्यावसायिक संचालन शुरू होने जा रहा है। मार्च में अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन (RDSO) द्वारा पूरे किए गए सफल ‘ऑसिलेशन ट्रायल रन’ के बाद मिली यह तकनीकी मंजूरी भारत के नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा नीतिगत और रणनीतिक बदलाव है। इस ऐतिहासिक कदम की सराहना करते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने इसे भविष्य के पर्यावरण-अनुकूल जन-परिवहन के लिए एक नया मानदंड और मील का पत्थर बताया है। इस शुरुआत के साथ ही भारत अब जर्मनी, स्वीडन, जापान और चीन जैसे दुनिया के उन चुनिंदा देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है जो इस अत्याधुनिक और शून्य-उत्सर्जन वाली तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो यह परियोजना भारत की विदेशी ईंधन और पारंपरिक डीजल पर निर्भरता को कम करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में क्रांतिकारी भूमिका निभाएगी। चूंकि हाइड्रोजन तकनीक बेहद संवेदनशील होती है, इसलिए रेलवे ने इसके सुरक्षित संचालन के लिए कड़े सुरक्षा और परिचालन दिशानिर्देश लागू किए हैं। ट्रेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसमें उन्नत ‘लीक डिटेक्टर’ (Leak Detector) और ‘फ्लेम डिटेक्टर’ (Flame Detector) लगाए गए हैं, जिनकी धूल आदि से बचाव के लिए नियमित सफाई अनिवार्य की गई है। इसके अलावा, जींद में स्थापित हाइड्रोजन जनरेशन यूनिट को कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस के भंडारण और फिलिंग का रीफ्यूलिंग लाइसेंस (Refueling License) मिल चुका है, जिसकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय कंट्रोल रूम से चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है।

तकनीकी बारीकियों को संभालने के लिए दिल्ली के शकूरबस्ती में एक विशेष मेंटेनेंस डिपो बनाया गया है, जहां सुरक्षा मानकों के तहत रीफ्यूलिंग और ऑनबोर्ड संचालन में तैनात कर्मचारियों को व्यापक प्रशिक्षण के बाद ‘सक्षमता प्रमाण पत्र’ दिया जाएगा। इतना ही नहीं, शुरुआती तीन महीनों तक प्रमाणित विशेषज्ञों की एक टीम हर सफर में ट्रेन के साथ रहेगी ताकि किसी भी अप्रत्याशित तकनीकी चुनौती से तुरंत निपटा जा सके। यह परियोजना न केवल भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को वैश्विक पटल पर मजबूती से पेश करती है, बल्कि देश में एक प्रदूषण-मुक्त और आधुनिक रेल युग की शुरुआत का शंखनाद भी करती है।

रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोजन ईंधन सेल (Hydrogen Fuel Cell) तकनीक को भारतीय परिस्थितियों और पटरियों के अनुकूल ढालना एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी, जिसे देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सफलतापूर्वक पार कर लिया है। भविष्य में इस तकनीक के विस्तार से भारी मालगाड़ियों और लंबी दूरी की यात्री ट्रेनों के परिचालन में भी क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है। यह पहल वैश्विक मंच पर भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को तो प्रदर्शित करती ही है, साथ ही यह आम जनता को एक स्वच्छ, शोर-मुक्त और आधुनिक यात्रा का अनुभव भी प्रदान करेगी। आने वाले समय में हरित ऊर्जा के इस विकल्प को देश के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जाएगा, जो भारतीय रेल को विश्व की सबसे बड़ी हरित रेलवे प्रणाली बनाने के मार्ग में मील का पत्थर साबित होगा।

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