सीमा से संसद तक: कैसे जनरल खंडूड़ी बने ईमानदार राजनीति की सबसे मजबूत पहचान?

देहरादून। Bhuvan Chandra Khanduri भारतीय राजनीति और सैन्य इतिहास का ऐसा नाम हैं, जिन्होंने सीमा पर देश की रक्षा से लेकर लोकतंत्र के मंच तक राष्ट्र सेवा को अपना सर्वोच्च धर्म माना। फौजी अनुशासन, सादगी और ईमानदार छवि के कारण जनरल खंडूड़ी आज भी उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश में सम्मान के साथ याद किए जाते हैं।

1 अक्टूबर 1934 को जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी ने वर्ष 1954 में भारतीय सेना की प्रतिष्ठित ‘कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स’ में सैन्य अधिकारी के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने देश के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में सेवा दी और 1962 के भारत-चीन युद्ध के साथ-साथ 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों के दौरान अहम भूमिका निभाई। सैन्य अभियानों में उनकी तकनीकी दक्षता और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें सेना के बेहतरीन अधिकारियों में शामिल किया।

लगभग 36 वर्षों की निष्कलंक सेवा के बाद उन्हें 26 जनवरी 1982 को ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1991 में मेजर जनरल पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने आराम का रास्ता नहीं चुना, बल्कि राजनीति में आकर जनसेवा को नई दिशा दी।

राजनीति में प्रवेश के बाद भी उन्होंने अपने सिद्धांतों और अनुशासन से कभी समझौता नहीं किया। उनकी सादगीपूर्ण जीवनशैली और बेदाग छवि ने गढ़वाल क्षेत्र की जनता का भरोसा जीता और उन्हें कई बार संसद तक पहुंचाया। लोकसभा में उन्होंने हमेशा उत्तराखंड और देशहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया।

पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की सरकार में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने देश की सड़क संरचना को नई पहचान दी। स्वर्ण चतुर्भुज जैसी ऐतिहासिक परियोजनाओं को गति देकर उन्होंने आधुनिक भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जनरल खंडूड़ी का पूरा जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश है कि सार्वजनिक जीवन में असली सम्मान पद से नहीं, बल्कि ईमानदारी, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण से मिलता है।

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