पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां 15 वर्षों से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस को हटाकर भाजपा ने सरकार बना ली है। इस ऐतिहासिक बदलाव के बाद अब सभी की नजरें नई सरकार के चुनावी वादों और राज्य की आर्थिक स्थिति पर टिक गई हैं। सबसे अहम सवाल यही है कि सीमित संसाधनों और भारी कर्ज के बीच सरकार अपने वादों को कैसे पूरा करेगी।
भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को हर महीने 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता देने का वादा किया है। इस योजना का उद्देश्य कमजोर वर्गों को आर्थिक सहारा देना है, लेकिन इससे राज्य के खजाने पर बड़ा बोझ पड़ने की आशंका है। इसके अलावा, सातवें वेतन आयोग को लागू करने और महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का वादा सरकारी कर्मचारियों के लिए राहत भरा कदम माना जा रहा है, लेकिन इससे राजस्व खर्च में भारी इजाफा होगा।
वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, राज्य की स्थिति पहले से ही दबाव में है। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का 3.6 प्रतिशत रहा है, जो आने वाले वर्षों में घटकर 2.9 प्रतिशत होने का अनुमान है। हालांकि यह सुधार वित्तीय अनुशासन का संकेत देता है, लेकिन नए खर्चों के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं छोड़ता।
राज्य का कुल कर्ज जीएसडीपी का लगभग 38 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो एक चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। इसके साथ ही, राज्य की अपनी कर आय कुल राजस्व का केवल 41 प्रतिशत ही है, जिससे केंद्र पर निर्भरता भी साफ दिखाई देती है।
खर्च के पैटर्न पर नजर डालें तो बजट का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और सब्सिडी में खर्च होता है, जबकि विकास कार्यों के लिए पूंजीगत व्यय बेहद सीमित है। ऐसे में नई सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों के बीच संतुलन कैसे बनाए।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए जनता की अपेक्षाओं को किस तरह पूरा करती है।