सियासी बिसात: धन-मदन का कद घटना पड़ेगा भारी!

मिशन 2027′: जातीय संतुलन और पुराने दिग्गजों के पर कतरने वाली रणनीति

बाहरी तरजीह : बदलाव का सबसे नकारात्मक पहलू मंत्रियों के मनोबल पर पड़ने पड़ने की संभावना

अमरनाथ सिंह, देहरादून।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं, और धामी सरकार का हालिया कैबिनेट विस्तार इसी ‘मिशन 2027’ की पहली बड़ी किश्त माना जा रहा है। आने वाले चुनावों के समीकरणों का विश्लेषण करें तो साफ झलकता है कि भाजपा इस बार किसी भी तरह के जोखिम से बचने के लिए ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और ‘क्षेत्रीय संतुलन’ के पुराने फॉर्मूले को नए कलेवर में उतार रही है। राज्य की राजनीति में पारंपरिक रूप से ठाकुर और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जो कुल आबादी का लगभग 60 फीसद हिस्सा हैं। मुख्यमंत्री धामी के नेतृत्व में पार्टी ने इस बार ब्राह्मण चेहरों और दलित प्रतिनिधित्व को कैबिनेट में प्रमुखता देकर इस संतुलन को साधने की कोशिश की है। हरिद्वार से मदन कौशिक और देहरादून से खजान दास जैसे अनुभवी ब्राह्मण और दलित नेताओं की कैबिनेट में वापसी इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि मैदानी इलाकों में वोट बैंक की किसी भी सेंधमारी को रोका जा सके।
वैसे हाल ही में किए गए मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों के फेरबदल ने सियासी हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है। इस बदलाव को सतह पर प्रशासनिक सुधार बताया जा रहा है, लेकिन बारीक नजर डालने पर इसके पीछे गहरी राजनीतिक बिसात बिछी नजर आती है। विशेषकर डॉ. धन सिंह रावत जैसे संगठननिष्ठ चेहरे से स्वास्थ्य जैसा भारी-भरकम विभाग छीनकर कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले सुबोध उनियाल को सौंपना और हरिद्वार के कद्दावर नेता मदन कौशिक को उनकी वरिष्ठता के मुकाबले अपेक्षाकृत हल्के विभाग देना चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इसके पीछे की रणनीति को समझने के लिए भाजपा के भीतर की गुटीय राजनीति और आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों के दबाव को देखना जरूरी है।
इस फेरबदल के पीछे का पहला मुख्य कारण कांग्रेस से आए नेताओं का बढ़ता दबदबा और उन्हें संतुष्ट रखने की मजबूरी प्रतीत होती है। भाजपा आलाकमान शायद यह संदेश देना चाहता है कि चुनावी साल में ‘मूल बनाम बाहरी’ का मुद्दा गौण है और जीत के लिए उन चेहरों पर दांव लगाना जरूरी है जिनके पास प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ अपनी सीटों पर मजबूत पकड़ हो! दूसरा कारण, मुख्यमंत्री धामी द्वारा अपनी सरकार के भीतर शक्ति का नया संतुलन बनाना है! पुराने दिग्गजों के पर कतरकर नए समीकरणों को जन्म देना सत्ता पर अपनी पकड़ को और अधिक स्वायत्त बनाने का प्रयास है! तीसरा कारण गुटीय राजनीति की छाया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत और अनिल बलूनी खेमे से नजदीकी भी इन मंत्रियों के लिए प्रतिकूल साबित हुई है! चौथा पहलू क्षेत्रीय संतुलन और जातिगत समीकरणों को नए सिरे से साधना है, ताकि मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच उपजे असंतोष को कम किया जा सके। पांचवां कारण प्रदर्शन या ‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता) का बहाना हो सकता है, जिसके जरिए नए मंत्रियों के लिए जगह बनाई गई है। अंत में, यह कदम पार्टी के भीतर ‘कलेक्टिव लीडरशिप’ के बजाय एक केंद्रित नेतृत्व को स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है!
जहां तक डॉ. धन सिंह रावत के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में सफर का सवाल है, तो बीते चार वर्षों में इस क्षेत्र में कई उल्लेखनीय बदलाव देखे गए। उनके कार्यकाल में प्रदेश को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में ‘निक्षय मित्र’ अभियान, अटल आयुष्मान योजना के तहत लाखों लोगों को कैशलेस इलाज, और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में टेली-मेडिसिन सेवाओं का विस्तार उनकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल रहा। साथ ही, मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि और चिकित्सकों की भारी कमी को दूर करने के लिए उनकी सक्रियता ने विभाग को एक नई गति दी थी। यदि वे कार्यकाल के अंत तक इस पद पर रहते, तो चल रही परियोजनाओं का तार्किक समापन बेहतर ढंग से हो पाता। अब नए मंत्री सुबोध उनियाल के पास चुनावी आचार संहिता लगने से पहले महज कुछ महीनों का समय है, जो किसी भी विभाग की ‘कायाकल्प’ के लिए अपर्याप्त माना जा सकता है।
इस बदलाव का सबसे नकारात्मक पहलू मंत्रियों के मनोबल पर पड़ने वाला असर है। विशेष रूप से धन सिंह रावत के लिए श्रीनगर विधानसभा सीट पर राह मुश्किल हो सकती है, जहां उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस के कद्दावर नेता गणेश गोदियाल से है। स्वास्थ्य जैसे बड़े महकमे के हाथ से निकलने के बाद कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया है कि पार्टी के समर्पित नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है। ऐसे में चुनावी समर में उतरे मंत्रियों के लिए अपने गढ़ को बचाना और विपक्षी हमलों का जवाब देना एक बड़ी चुनौती होगी। यह फेरबदल केवल विभागों का आवंटन नहीं है, बल्कि आगामी चुनावों से पहले भाजपा के भीतर चल रही वर्चस्व की लड़ाई का वह अध्याय है, जिसके परिणाम आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत की नई दिशा तय करेंगे।

‘राजनीति में पद और विभाग बदलते रहते हैं, लेकिन कर्मठता और निष्ठा का कोई विकल्प नहीं होता। विभाग बदलना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है, इसलिए इसे कद बढ़ने या घटने से जोड़कर देखना और इस पर राजनीति करना उचित नहीं है। हम एकजुट होकर प्रदेश के चहुंमुखी विकास के लिए संकल्पित हैं। डॉ. रावत के अनुसार 2017 से उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को उस दौर से बाहर निकाला जब पहाड़ों पर डॉक्टरों की भारी कमी थी। अपनी 9 साल की तपस्या के दम पर उन्होंने विभाग में रिकॉर्ड 10,000 से अधिक नियुक्तियां कीं और दुर्गम क्षेत्रों तक 108 एम्बुलेंस व टेली-मेडिसिन का जाल बिछाया। पहाड़ की चुनौतियां भले ही बड़ी हैं, लेकिन ठोस नतीजों के साथ जनसेवा का यह क्रम निरंतर जारी रहेगा।

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