क्या विलासिता में डूबा व्यक्ति संत कहलाने का अधिकारी है? आधुनिक ‘कॉर्पोरेट गुरुओं’ पर तीखा व्यंग्य

कृष्ण गोपाल विद्यार्थी  भारतीय परंपरा में संन्यास और संतत्व को त्याग, तपस्या और वैराग्य का प्रतीक माना गया है। किंतु आधुनिक समय में आध्यात्मिकता के नाम पर बढ़ती भौतिकता और विलासिता ने इन मूल्यों को चुनौती दी है। इसी विडंबना पर आधारित यह व्यंग्य वर्तमान समाज के उस दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जहां धर्म और भोग का अजीब संगम देखने को मिल रहा है।

संन्यास का वास्तविक अर्थ ही त्याग है। शास्त्रों में ‘अपरिग्रह’ यानी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना संन्यासी के प्रमुख गुणों में माना गया है। किंतु आज अनेक तथाकथित धर्मगुरु भव्य आश्रमों, आलीशान जीवनशैली और ऐश्वर्यपूर्ण साधनों के बीच रहते हुए भी स्वयं को संत कहलवाते हैं। यह स्थिति आध्यात्मिक आदर्शों के विपरीत प्रतीत होती है।

भारतीय दर्शन में धन और अन्न की शुद्धता को अत्यंत महत्व दिया गया है। कहा जाता है—“जैसा खाए अन्न, वैसा होवे मन।” ऐसे में यदि कोई धर्मगुरु अनैतिक स्रोतों से प्राप्त धन को स्वीकार करता है, तो वह स्वयं भी उस अशुद्धता से अछूता नहीं रह सकता। शास्त्रों में यह भी स्पष्ट कहा गया है कि दान लेने वाला उतना ही पवित्र होना चाहिए जितना दान देने वाला।

इतिहास में आश्रम और मठ समाज सेवा, शिक्षा और धर्म संरक्षण के केंद्र हुआ करते थे। उनका उद्देश्य गुरु की व्यक्तिगत विलासिता नहीं, बल्कि जनकल्याण था। परंतु वर्तमान समय में कई स्थानों पर आश्रमों का स्वरूप बदलकर एक प्रकार के ‘आध्यात्मिक प्रतिष्ठान’ जैसा हो गया है, जहां व्यवस्थाएं किसी कॉर्पोरेट संस्थान की तरह संचालित होती दिखाई देती हैं।

पिछले कुछ दशकों में ‘ब्रांड गुरु’ संस्कृति का उदय हुआ है, जिसमें धर्म भी बाजार की वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। यहां अनुयायियों को भक्त नहीं, बल्कि उपभोक्ता की दृष्टि से देखा जाता है और दान को निवेश के रूप में प्रचारित किया जाता है। इस प्रवृत्ति ने धर्म और अध्यात्म की सादगी को प्रभावित किया है।

व्यंग्य यह भी इंगित करता है कि आज कई धर्मगुरु सत्ता के गलियारों से निकटता बनाए रखते हैं। संन्यासी का आदर्श जहां राजसत्ता से दूर रहकर समाज का मार्गदर्शन करना था, वहीं अब कुछ तथाकथित संत राजनीतिक प्रभाव और सुविधाओं के मोह में उलझते दिखाई देते हैं। इससे उनकी निष्पक्षता और वैराग्य पर प्रश्नचिह्न लगने लगता है।

समाज में समय-समय पर ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जहां धर्म की आड़ में आर्थिक अनियमितताओं और नैतिक विचलनों के आरोप लगे। इससे आम लोगों के मन में वास्तविक संतों के प्रति भी संदेह पैदा होता है। यही कारण है कि आज जरूरत इस बात की है कि संतत्व का मूल्यांकन बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि उनके चरित्र और आचरण से किया जाए।

भारतीय ग्रंथों में भी ऐसे पाखंडी साधुओं का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने धर्म का वेश धारण कर स्वार्थ साधने का प्रयास किया। रामायण में कालनेमि का प्रसंग इसका उदाहरण है, जिसने साधु का रूप धारण कर छल करने की कोशिश की थी। यह प्रसंग आज भी समाज को सावधान रहने की प्रेरणा देता है।

आज के दौर में आध्यात्मिकता का एक नया रूप भी देखने को मिल रहा है—‘डिजिटल वैराग्य’। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्रवचनों के माध्यम से आध्यात्मिकता का प्रसार तो हुआ है, लेकिन इसके साथ ही प्रदर्शन और प्रचार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। ऐसे में आम व्यक्ति के लिए सच्चे और दिखावटी संत के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है।

व्यंग्य का सार यही है कि संतत्व का संबंध बाहरी चमक-दमक से नहीं, बल्कि भीतर की तपस्या और सादगी से है। यदि कोई व्यक्ति लोभ और भोग में डूबा हुआ है, तो वह संत कहलाने का नैतिक अधिकार खो देता है। समाज को भी चाहिए कि वह चमत्कार और प्रचार के बजाय चरित्र और त्याग को ही आध्यात्मिकता की असली कसौटी माने।

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