कोलकाता के मेट्रो चैनल पर पिछले कुछ दिनों से एक अलग तरह का राजनीतिक दृश्य देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही है। पार्टी का आरोप है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग के कुछ फैसले निष्पक्ष नहीं हैं और वे केंद्र सरकार के दबाव में लिए जा रहे हैं।
सत्ता में रहते हुए किसी राजनीतिक दल का सड़क पर उतरकर विरोध करना स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करता है। आमतौर पर विरोध प्रदर्शन विपक्षी दलों की रणनीति माना जाता है, लेकिन जब वही काम सत्तारूढ़ दल करे तो राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो जाती है।
मेट्रो चैनल पर आयोजित प्रदर्शन के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि चुनाव आयोग के कई निर्णय राजनीतिक रूप से प्रेरित लगते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग भाजपा शासित केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है और ऐसे फैसले ले रहा है जिनसे भाजपा को चुनावी लाभ मिल सकता है।
ममता बनर्जी ने साफ शब्दों में कहा कि अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जाएगी तो उनकी पार्टी चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने इसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी संघर्ष बताया।
इस विरोध प्रदर्शन में टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी काफी मुखर नजर आए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के कुछ कदम राज्य सरकार को डराने और चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश जैसे लगते हैं। उनके अनुसार यह आंदोलन पश्चिम बंगाल के लोगों को बिना किसी दबाव के मतदान का अधिकार दिलाने के लिए है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास के एक बड़े आंदोलन की याद भी ताजा कर दी है—सिंगूर आंदोलन। 2000 के दशक के मध्य में ममता बनर्जी ने सिंगूर में टाटा की नैनो परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ लंबा आंदोलन किया था। उस समय वह विपक्ष में थीं और यह आंदोलन वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ जनप्रतिरोध का बड़ा प्रतीक बन गया था।
सिंगूर आंदोलन ने राज्य की राजनीति को बदल दिया और 2011 में 34 साल पुरानी वाम सरकार का अंत हुआ। उसी आंदोलन ने ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
लेकिन आज की स्थिति अलग है। अब ममता बनर्जी खुद राज्य की मुख्यमंत्री हैं और उनकी पार्टी सत्ता में है। ऐसे में जब सत्तारूढ़ दल ही सड़क पर उतरकर विरोध करता है तो सवाल उठता है कि यह विरोध आखिर किसके खिलाफ है—सरकार के रूप में या विपक्ष के रूप में?
विपक्षी दलों ने इसी मुद्दे को लेकर टीएमसी पर निशाना साधा है। भाजपा ने इस प्रदर्शन को “राजनीतिक ड्रामा” करार दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग केवल निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अपना काम कर रहा है और मुख्यमंत्री का यह विरोध संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश है।
कांग्रेस ने भी इस पर चिंता जताई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि किसी सत्तारूढ़ दल का चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था के खिलाफ इस तरह का विरोध असामान्य है और इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
वहीं वाम दलों ने इसे सबसे बड़ी विडंबना बताया है। उनका कहना है कि जो नेता कभी सरकार के खिलाफ आंदोलनों के जरिए राजनीति में आगे बढ़ीं, वही आज सत्ता में रहते हुए आंदोलन कर रही हैं।
यही वह बिंदु है जहां से असली सवाल खड़े होते हैं। क्या यह विरोध वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा के लिए है, या फिर चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल बनाने की रणनीति? और जब सत्तारूढ़ पार्टी ही न्याय की मांग करते हुए सड़कों पर उतरती है, तो वह न्याय आखिर किससे मांग रही है?