क्या हिमालय में बढ़ रहा है भूकंप का खतरा? IIT रुड़की के प्रोफेसर ने किया बड़ा खुलासा

Shri Trilochan Upreti Smriti Himalayan Research Institute के तत्वावधान में व्याख्यान श्रृंखला के प्रथम कार्यक्रम के रूप में “हिमालय का उत्थान एवं भूकंपीय खतरा” विषय पर एक ऑनलाइन वेबिनार का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में Indian Institute of Technology Roorkee के प्रो. संदीप सिंह ने विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याख्यान प्रस्तुत कर हिमालय की उत्पत्ति, संरचना और भूकंपीय जोखिमों पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रज्ञा प्रवाह से जुड़े लेखक एवं स्तंभकार भगवती प्रसाद ‘राघव’ उपस्थित रहे। संस्थान के सचिव नवीन उप्रेती के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम का संयोजन डॉ. मनीष उनियाल (एसोसिएट प्रोफेसर, भौतिकी विभाग, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय, पौड़ी परिसर) ने किया।

 55 मिलियन वर्ष पूर्व शुरू हुई हिमालय की कहानी

प्रो. संदीप सिंह ने बताया कि लगभग 55 मिलियन वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव से हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा में बढ़ने से समुद्र तल में जमा अवसादी शिलाएं ऊपर उठीं और वर्तमान हिमालय का स्वरूप बना। यह प्रक्रिया आज भी जारी है, इसलिए हिमालय को युवा और गतिशील पर्वत प्रणाली माना जाता है।

भू-आकृतिक दृष्टि से हिमालय को ग्रेटर हिमालय, लेसर हिमालय, शिवालिक और इंडो-गंगा फोरलैंड बेसिन जैसे भागों में विभाजित किया जाता है।

 हिमालय का पर्यावरणीय महत्व

वक्ता ने बताया कि हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप के लिए प्राकृतिक जलवायु अवरोध का कार्य करता है। यह मानसूनी पवनों को रोककर भारत में वर्षा सुनिश्चित करता है और मध्य एशिया की ठंडी हवाओं को अवरुद्ध करता है। परिणामस्वरूप भारत में अनुकूल जलवायु और तिब्बत क्षेत्र में शीत मरुस्थल जैसी स्थिति बनती है।

हिमालय गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी सदानीरा नदियों का उद्गम स्थल है, जो देश की कृषि और पेयजल आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न ऊंचाइयों और जलवायु परिस्थितियों के कारण यह जैव-विविधता का समृद्ध केंद्र है। हिमालय से निकली नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से इंडो-गंगा-ब्रह्मपुत्र का उपजाऊ मैदान निर्मित हुआ, जो विश्व के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में शामिल है।

क्यों संवेदनशील है हिमालय?

प्रो. सिंह ने स्पष्ट किया कि प्लेटों की निरंतर गति से ऊर्जा का संचय होता रहता है। जब यह ऊर्जा अचानक मुक्त होती है, तो भूकंप उत्पन्न होता है। भारत के भूकंपीय मानचित्र के अनुसार हिमालयी क्षेत्र जोन IV और V में आता है, जो उच्च जोखिम वाले क्षेत्र हैं।

उन्होंने भूकंपीय तरंगों—P, S, Love और Rayleigh तरंगों—का सरल विश्लेषण करते हुए बताया कि ये तरंगें किस प्रकार धरातल को प्रभावित करती हैं। भूकंप मापन के लिए मर्काली और रिक्टर पैमानों का भी उल्लेख किया गया।

 ऐतिहासिक भूकंपों की चेतावनी

1897 का असम भूकंप, 1905 का कांगड़ा भूकंप, 1934 का नेपाल-बिहार भूकंप, 1991 का उत्तरकाशी और 1997 का चमोली भूकंप हिमालय की सक्रियता के उदाहरण हैं। इन घटनाओं ने स्पष्ट किया है कि इस क्षेत्र में सुनियोजित विकास और भूकंप-रोधी निर्माण अनिवार्य है।

पारंपरिक वास्तुकला से सीख

वेबिनार में हिमालयी पारंपरिक निर्माण शैली पर भी चर्चा हुई। लकड़ी और पत्थर के लचीले जोड़ भूकंप के झटकों को सहने में सक्षम होते हैं। बिना कीलों के बने लकड़ी के ढांचे हल्की गति को अवशोषित कर तनाव कम करते हैं। यह पारंपरिक ज्ञान आधुनिक भूकंप-रोधी तकनीकों के लिए प्रेरणादायक है।

कार्यक्रम में अनेक विद्वानों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों की उपस्थिति रही। वेबिनार अत्यंत ज्ञानवर्धक और समसामयिक विषय पर आधारित रहा। वक्ताओं ने हिमालय क्षेत्र में जागरूकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संतुलित विकास की आवश्यकता पर बल दिया।

 

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