मणिपुर: ढाई साल बाद मेइतेई-कुकी विधायकों की बैठक से जगी उम्मीद, तो बफर जोन में गोलीबारी से नई टेंशन

सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
इंफाल। मणिपुर की अशांत जमीन पर ढाई साल बाद एक हल्की-सी उम्मीद की किरण नजर आई। मई 2023 से चले आ रहे जातीय संघर्ष के बाद पहली बार मेइतेई और कुकी-ज़ो समुदाय के भाजपा विधायक एक ही मंच पर आए। दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में हुई बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, विधानसभा अध्यक्ष थोक्चोम सत्यब्रत सिंह समेत 34 विधायक शामिल हुए। इनमें कुकी समुदाय के चार विधायक नेम्चा किप्गेन, एलएम खाउते, लेल्जमांग हाओकिप और एनगुरसांगलुर हमार भी थे। बैठक के बाद सभी ने एकजुट होकर फोटो खिंचवाई, जिसे राज्य में सुलह की नई शुरुआत का संकेत माना जा सकता है। लेकिन कुकी संगठनों की पुनः अलग प्रशासन की मांग और मंगलवार की रात बफर जोन में गोलीबारी ने फिर शंका के बादल पैदा कर दिए हैं।

बात नई दिल्ली बैठक से पैदा निहितार्थ की करें तो भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष और उत्तर-पूर्व प्रभारी संबित पात्रा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में पहले अलग-अलग सत्र चले, फिर संयुक्त चर्चा। फोकस शांति बहाली, विकास कार्यों को तेज करने और दोनों समुदायों के इलाकों में स्वतंत्र आवागमन पर रहा। नेताओं की मानें तो ये “फलदायी” हैं। सभी विधायकों ने सामान्य स्थिति लौटाने का संकल्प लिया है। वहीं राजनीतिक विश्लेषक इसे “आइस-ब्रेकर” कह रहे हैं। एक ऐसा प्रतीकात्मक कदम जो लंबे समय से जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिश है।

लेकिन दिल्ली की यह तस्वीर इंफाल घाटी और पहाड़ियों की हकीकत से बहुत अलग है। कुकी-ज़ो काउंसिल (केजेडसी) और अन्य कुकी संगठनों ने बैठक में शामिल विधायकों की तीव्र निंदा की है। उनका साफ कहना है कि ये विधायक कुकी जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते। मणिपुर से अलग प्रशासन की मांग जनता की है, न कि सिर्फ कुछ विधायकों की। एक बयान में कहा गया, “युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है। हम मणिपुर की मौजूदा सरकार में भाग नहीं लेंगे।”

तीन कुकी विधायक— लेत्पाओ हाओकिप, पाओलियनलाल हाओकिप और वुंग्जागिन वाल्टे बैठक से दूर रहे, जो समुदाय के गहरे विभाजन को रेखांकित करता है।

कुकी पक्ष मेइतेई-प्रभुत्व वाले इलाकों में स्वतंत्र आवागमन की मांग कर रहा है, लेकिन सू समझौते वाले उग्रवादी समूह अभी भी सक्रिय हैं।

उम्मीदों को तगड़ा झटका तब लगा जब 16 दिसंबर की देर शाम बिष्णुपुर जिले के तोरबंग बफर जोन में फिर गोलीबारी हुई। फौगाक्चाओ इखाई और तोरबंग सबल लेईकाई इलाके में देर रात गोलियों की आवाजें गूंजीं, जिससे इलाका फिर तनावग्रस्त हो गया। कुकी-ज़ो काउंसिल ने इसे “नए संघर्ष की चेतावनी” बताया, जबकि सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई में चेतावनी गोली चलाई।

यह घटना ठीक उस समय हुई जब राज्य में विस्थापितों की घर-वापसी शुरू हुई थी।

घर लौटते परिवारों का दर्द और डर:
सकारात्मक संकेत के रूप में बिष्णुपुर के तोरबंग क्षेत्र में मेइतेई विस्थापितों की वापसी शुरू हुई। ढाई साल रिलीफ कैंपों में गुजारने के बाद तकरीबन 389 परिवार लौट रहे हैं। सरकार ने प्रत्येक परिवार को 40 हजार रुपये दिए और बसने पर 35 हजार अतिरिक्त देने का वादा किया। लेकिन गोलीबारी के बाद लौटे लोग फिर डर के साए में हैं। रात भर महिलाएं-बच्चे जागते रहे, सुरक्षा की मांग तेज हो गई है।

हिंसा की जड़ मेइतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग में है, जिसे 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट ने समर्थन दिया था। कुकी-ज़ो इसे खुद को हाशिये पर धकेले जाने की साजिश मानते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह पर पक्षपात के आरोप लगाते आ रहे हैं। अब तक 258 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। 60 हजार से अधिक विस्थापित हैं। 2025 में हिंसा कम हुई, लेकिन छिटपुट घटनाएं जारी।

विपक्षी कांग्रेस ने बैठक को “क्रैश कोर्स” बताया। प्रदेश अध्यक्ष केईशाम मेघचंद्र सिंह बोले, “कानून-व्यवस्था बहाल करने की बजाय विधायकों को दिल्ली बुलाकर बहाने सिखाये जा रहे हैं।”

इस बीच सूत्रों से पता चला है कि राष्ट्रपति शासन फरवरी 2026 तक बढ़ सकता है, लेकिन अगर शांति प्रक्रिया चली तो जनवरी में नई सरकार बनाने की कोशिशें हो सकती हैं।

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