मिजोरम में बस गए म्यांमारी नागरिकों के 11 गांव

मिजो स्टूडेंट्स यूनियन कहा- फौरन हटाई जाएं ये अवैध बस्तियां

सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
आइजोल। सैन्य जुंता के हमलों से जान बचाने के नाम पर मिजोरम में घुसे तकरीबन 32 हजार म्यांमार नागरिकों में से अधिकांश ने अब बाकायदे राज्य के पांच सीमाई जिलों में अपने गांव बसा लिए हैं। यह सनसनीखेज खुलासा एक आरटीआई में होने के बाद युवा छात्र संगठनों ने सरकार पर हमला बोल तत्काल इन अवैध गांवों को नष्ट करने की मांग की है।

हालांकि निजी सुरक्षा कारणों से आरटीआई करने वाले का खुलासा नहीं किया गया। जानकारी मिली है कि इनमें सात गांव लुंग्लेई जिले और बाकी एक-एक ममित, चम्फाई, खावजाल एवं सर्चिप जिलों में हैं। भारत सरकार इन म्यांमारियों को शरणार्थी नहीं मानती।

लेकिन मिजोरम सरकार इनके गांवों में बिजली, पानी, स्वास्थ्य से लेकर हर तरह की मानवीय जरूरतें मुहैया करा रही है। चिंता की बात यह भी है कि केंद्र के लगातार निर्देश के बावजूद राज्य सरकार अभी तक बमुश्किल 39 फीसदी म्यांमारियों का ही बायोमैट्रिक करा पाई है। जबकि इनके रखरखाव पर तकरीबन 38 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैैं।
कुल मिलाकर 11 ऐसे गांवों ने राज्य की आंतरिक सुरक्षा, संसाधनों और जनसांख्यिकी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मिजो स्टूडेंट्स यूनियन (एमएसयू) ने राज्य सरकार के इस रवैये का तीखा विरोध करते हुए इन गांवों को तत्काल समाप्त करने की मांग की है।

एमएसयू के महासचिव लालरिंडिक चुआंगो ने कहा है कि, “ये अवैध बस्तियां न केवल राज्य की सीमाओं को कमजोर कर रही हैं, बल्कि स्थानीय संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डाल रही हैं। सरकार को मानवता के नाम पर इन शरणार्थियों को बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं प्रदान करने से रोकना चाहिए।” संगठन ने जोर देकर कहा कि म्यांमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से राज्य में शरणार्थियों का प्रवाह बढ़ा है, लेकिन यह अब अनियंत्रित रूप धारण कर चुका है।
अवैध बस्तियों का फैलाव: आंकड़ों की पड़ताल
सरकारी अधिकारियों ने माना है कि लुंग्लेई जिले में सबसे अधिक सात अवैध गांव बस चुके हैं। यह जिला बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा से सटा हुआ है, जहां से शरणार्थी आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। ममित, चम्फाई, खावजाल और सर्चिप जिलों में एक-एक बस्ती की जानकारी सामने आई है। इन गांवों में मुख्य रूप से चिन-कुकी-जो समुदाय के लोग रह रहे हैं, जो म्यांमार के चिन राज्य से भागे हैं।

राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, म्यांमार से लगभग 31,300 शरणार्थी मिजोरम में शरण लिए हुए हैं, जिनमें से 39 प्रतिशत (करीब 12,170) का बायोमेट्रिक डेटा संग्रहित किया जा चुका है। हालांकि, केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद पूर्ण बायोमेट्रिक प्रक्रिया में देरी हो रही है।
जुलाई 2025 में चिन राज्य में दो प्रतिद्वंद्वी सशस्त्र समूहों—चिन नेशनल डिफेंस फोर्स (सीएनडीएफ) और चिनलैंड डिफेंस फोर्स-ह्वालंगोरम (सीडीएफ-एच)—के बीच हिंसक संघर्ष के बाद करीब 5,000 शरणार्थी चम्फाई जिले में पहुंचे थे। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ये बस्तियां जंगलों को काटकर बसाई जा रही हैं, जिससे पर्यावरणीय क्षति के साथ-साथ स्थानीय जनजातियों के अधिकारों का हनन हो रहा है।

लुंग्लेई जिला उपायुक्त ने अप्रैल 2025 में एक बैठक में गांव परिषदों और युवा मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) से अपील की थी कि शरणार्थियों को भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित दस्तावेज जैसे वोटर आईडी, आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र और राशन कार्ड न दिए जाएं।सरकार की मानवीय नीति: सहायता या बोझ?मिजोरम सरकार ने इन शरणार्थियों को ‘मानवता के आधार पर’ सहायता प्रदान करने का फैसला लिया है। राज्य के गृह विभाग के अधिकारियों के अनुसार, अब तक शरणार्थियों पर 38 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुका है। एनजीओ जैसे सेंट्रल यंग मिजो एसोसिएशन (सीवाईएमए) और चर्च संगठन भी भोजन, आश्रय और चिकित्सा सहायता में योगदान दे रहे हैं।

मुख्यमंत्री लल्दुहोमा ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि चिन समुदाय मिजो लोगों से जातीय और सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ है, इसलिए इन्हें वापस भेजना संभव नहीं।हालांकि, यह नीति विवादों में घिरी हुई है। वाईएमए जैसे संगठनों ने चेतावनी दी है कि शरणार्थी अपराधों में शामिल हो रहे हैं, जैसे ड्रग तस्करी और संपत्ति विवाद। अप्रैल 2025 में लुंग्लेई जिले में 1,971 म्यांमार शरणार्थियों और 63 बांग्लादेशी शरणार्थियों को अस्थायी पहचान पत्र जारी किए गए थे, लेकिन स्थानीय लोग दावा करते हैं कि कई शरणार्थी स्थायी रूप से बसने की कोशिश कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने अप्रैल 2024 में मिजोरम और मणिपुर को अवैध प्रवासियों का बायोमेट्रिक और जीवनी विवरण एकत्र करने का निर्देश दिया था, लेकिन मिजोरम ने इसे पूरी तरह लागू नहीं किया। गृह मंत्रालय का मानना है कि ये ‘अवैध अप्रवासी’ मणिपुर जैसे राज्यों में अशांति का कारण बन सकते हैं।

एमएसयू का विरोध: स्थानीय हितों की रक्षा का आह्वान
मिजो स्टूडेंट्स यूनियन, जो राज्य का प्रमुख छात्र संगठन है, ने इन अवैध गांवों को ‘जनसांख्यिकीय आक्रमण’ करार दिया है। संगठन ने राज्य सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की है, जिसमें इन बस्तियों को ध्वस्त करना और शरणार्थियों को सीमा पर ही रोकना शामिल है। एमएसयू अध्यक्ष समुअल जोरमथानपुइया ने कहा, “हम मानवता का सम्मान करते हैं, लेकिन यह हमारी पहचान और संसाधनों पर खतरा है।

सरकार को केंद्र के साथ मिलकर सीमा सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए।”यह विरोध मिजोरम की जटिल सामाजिक गतिशीलता को उजागर करता है। एक ओर चिन-मिजो भाईचारे की भावना है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय निवासियों में असंतोष बढ़ रहा है। 2021 के तख्तापलट के बाद से मिजोरम ने 40,000 से अधिक शरणार्थियों को शरण दी है, लेकिन संसाधनों की कमी और अपराध की बढ़ती घटनाओं ने माहौल बिगाड़ दिया है।
यह मुद्दा पूर्वोत्तर भारत के व्यापक शरणार्थी संकट का हिस्सा है। म्यांमार के चिन राज्य से सटी 510 किलोमीटर सीमा के कारण चम्फाई, सियाहा, लॉन्गटलाई, ह्नाहथियल, सैतुअल और सर्चिप जिलों में प्रवाह सबसे अधिक है। बांग्लादेश से सटी 318 किलोमीटर सीमा पर भी ममित, लुंग्लेई और लॉन्गटलाई जिलों में बावम समुदाय के शरणार्थी आ रहे हैं।

मणिपुर में भी इसी तरह की समस्या है, जहां कुकी-जो समुदाय के शरणार्थी अवैध बस्तियां बसा रहे हैं। केंद्र सरकार ने भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने और फ्री मूवमेंट रेजीम (एफएमआर) को समाप्त करने का फैसला लिया है, जिसका मिजोरम और मणिपुर में विरोध हो रहा है। जो रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन (जोरॉ) जैसे संगठनों ने चेतावनी दी है कि इससे ‘खून का रिश्ता टूट जाएगा’।

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