रुड़की। इंसानियत की जीती-जागती मिसाल क्रांतिकारी शालू सैनी ने समाज सेवा के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा है। शालू सैनी ने कोरोना काल और उसके बाद भी पांच हजार से अधिक लावारिस मृतकों को अपना नाम देकर विधि-विधान के अनुसार अंतिम विदाई दी है। हर धर्म के मृतक के लिए उन्होंने उनके धर्मानुसार अंतिम संस्कार किया।
शहर के मोहल्ला दक्षिणी कृष्णा पुरी निवासी शालू सैनी साक्षी वेलफेयर ट्रस्ट की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। एक सिंगल मदर होने के बावजूद उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में अपने नाम की अलग पहचान बनाई। समाज सेवा के प्रति उनके निस्वार्थ भाव ने उन्हें पूरे प्रदेश और देश में लावारिसों की वारिस के रूप में प्रसिद्ध कर दिया।
शालू सैनी का यह योगदान इतना अद्वितीय है कि उन्होंने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी अपनी पहचान बनाई। लॉकडाउन के समय उन्होंने देखा कि लोग अपने प्रियजनों को खोकर दुःख में हैं, और कई मृतक बिना अंतिम संस्कार के पड़े हैं। इस दर्द ने उन्हें समाज सेवा के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया।
हाल ही में, थाना कोतवाली क्षेत्र से एक मुस्लिम लावारिस मृतक की सूचना मिलने पर शालू सैनी मौके पर पहुंचीं, मृतक को अपना नाम देकर विधि-विधानपूर्वक कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक किया। उनकी इस सेवा की खबर न केवल उत्तराखंड में बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी चर्चा का विषय बनी है।
शालू सैनी ने जनता से अपील की कि अंतिम संस्कार में इच्छानुसार कोई भी व्यक्ति अपनी सेवा प्रदान कर सकता है। उनके योगदान ने समाज में महिलाओं के लिए मिसाल कायम की है और यह संदेश दिया कि निस्वार्थ सेवा और इंसानियत की भावना के लिए कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता।
आज हजारों लोग उन्हें अपना आदर्श मानते हैं और उनके दिखाए मार्ग पर चलकर समाज सेवा में योगदान देना चाहते हैं।