भागवत कथा में नर्मदाशंकर का संदेश: माया नहीं, प्रभु का स्मरण ही है शाश्वत

हरिद्वार। कनखल स्थित श्री यंत्र मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को कथा व्यास स्वामी नर्मदाशंकर पुरी जयपुर वालों ने जीवन के मूलभूत सत्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य का असली कर्तव्य क्या है, इसका बोध भागवत कथा सुनने से ही होता है।

उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि मृत्यु निश्चित होने के बावजूद मनुष्य उसे स्वीकार नहीं करना चाहता। यही अज्ञान उसे माया को शाश्वत मानने पर विवश कर देता है। सामान्य इंसान अपने शरीर को ही प्रधान मान बैठता है, जबकि शरीर नश्वर है। जीवन का सच्चा उद्देश्य निष्काम भाव से प्रभु का स्मरण करना है, जिससे जन्म और मरण दोनों ही सुधर जाते हैं।

कथा व्यास ने बताया कि जब प्रभु अवतार लेते हैं तो वे माया के साथ आते हैं। लेकिन साधारण मनुष्य उस माया को ही वास्तविक समझ लेता है। यही कारण है कि लोग सांसारिक सुखों और भौतिक वस्तुओं में उलझे रहते हैं और ईश्वर का सच्चा स्वरूप नहीं पहचान पाते।

स्वामी नर्मदाशंकर ने भागवत के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए कहा कि मनुष्य को अपने कर्म ऐसे करने चाहिए जो निष्काम हों। वही सच्ची भक्ति है। जब व्यक्ति बिना किसी लोभ और मोह के प्रभु का स्मरण करता है, तो उसके कर्म भी पवित्र हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज की जीवनशैली में लोग भौतिकता में इतने व्यस्त हैं कि अध्यात्म और आत्मबोध की ओर ध्यान ही नहीं देते। भागवत कथा का यही उद्देश्य है कि लोगों को यह बोध कराया जाए कि संसार क्षणभंगुर है और प्रभु का नाम ही शाश्वत है।

इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त किया और निष्काम भाव से भक्ति का संकल्प लिया।

 

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