बांग्लादेश में 637 मॉब लिंचिंग पर वैश्विक चुप्पी पर उठे सवाल, इस्कॉन कोलकाता ने जताया रोष

 

कोलकाता। बांग्लादेश में पिछले एक वर्ष के भीतर मॉब लिंचिंग की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि पर अंतरराष्ट्रीय चुप्पी को लेकर इस्कॉन कोलकाता ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कनाडा स्थित संस्था ‘ग्लोबल सेंटर फॉर डेमोक्रेटिक गवर्नेंस (जीसीडीजी)’ की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2024 से जुलाई 2025 के बीच 637 मॉब लिंचिंग की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 41 पुलिसकर्मी भी मारे गए।

इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष एवं प्रवक्ता राधारमण दास ने इसे मानवता पर कलंक करार देते हुए कहा, “यह दिल दहला देने वाली स्थिति है। बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, वह अत्यंत दुखद है, और उससे भी अधिक चिंताजनक है वैश्विक चुप्पी। हर दिन हिंदू, ईसाई और बौद्ध जैसे अल्पसंख्यकों पर हमले, महिलाओं का अपहरण, जबरन धर्मांतरण, और पीड़ितों की शिकायतें तक दर्ज न होना दर्शाता है कि वहां कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।

राजनीतिक अस्थिरता के बीच भड़की हिंसा
रिपोर्ट में बताया गया है कि अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई, जिसके चलते हिंसा चरम पर पहुंची। 2023 में जहां केवल 51 लिंचिंग की घटनाएं दर्ज हुई थीं, वहीं एक साल में यह संख्या 12 गुना बढ़कर 637 तक पहुंच गई।

रिपोर्ट में चार अगस्त, 2024 को जेसोर के ज़बीर होटल में 24 लोगों को जला कर मारने, और 25 अगस्त को रूपगंज (नारायणगंज) में गाजी टायर्स फैक्ट्री में आग लगाकर 182 लोगों की मौत जैसे भयावह कांडों का उल्लेख किया गया है।

न्याय व्यवस्था चरमराई, मीडिया पर सेंसरशिप
जीसीडीजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि मीडिया पर कड़ी सेंसरशिप के चलते सभी पीड़ितों की पहचान नहीं हो सकी, और रिपोर्ट अधूरी जानकारी पर आधारित है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि,

“सरकार के पतन से उत्पन्न शासन व्यवस्था का शून्य, न्यायपालिका की निष्क्रियता, संसाधनों से विहीन पुलिस बल, और छिपे या हमलों के शिकार स्थानीय नेताओं की अनुपस्थिति के कारण भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया है।

चिन्मय प्रभु का मामला भी उठा
राधारमण दास ने कहा, “चिन्मय प्रभु, जिन्हें पहले जमानत मिली थी, उन्हें एक अन्य फर्जी मामले में फिर से फंसा दिया गया है। एक साल हो गया लेकिन वह अब भी जेल में हैं। यह सिर्फ हिंदू समुदाय पर हमला नहीं है, ईसाई और बौद्धों को भी निशाना बनाया जा रहा है।”

अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग
उन्होंने अंत में कहा, “यह समय है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय हस्तक्षेप करे और मानवाधिकार संगठनों को एक स्वर में इन घटनाओं की निंदा करनी चाहिए। बांग्लादेश में मानवाधिकारों की लगातार हो रही अनदेखी पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है।”

 

Leave A Reply

Your email address will not be published.