मॉस्को : रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र कामचटका प्रायद्वीप में स्थित क्रशेनिनिकोव ज्वालामुखी में बीती रात जोरदार विस्फोट हुआ, जो बीते 600 वर्षों में पहला दर्ज विस्फोट है। यह जानकारी रूस के आपात स्थिति मंत्रालय ने रविवार को दी। विस्फोट के बाद ज्वालामुखी से राख का गुबार करीब 6,000 मीटर (लगभग 20,000 फीट) की ऊंचाई तक फैल गया।
मंत्रालय के अनुसार, यह ज्वालामुखी 1,856 मीटर ऊंचा है और आमतौर पर निष्क्रिय माना जाता था। हालांकि, हाल ही में क्षेत्र में आए भूकंपों के बाद इसमें हलचल देखी गई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह विस्फोट भूकंपीय गतिविधियों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ है।
विस्फोट के कारण हवाई क्षेत्र प्रभावित
विस्फोट के तुरंत बाद कामचटका क्षेत्र के हवाई मार्ग को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। क्षेत्रीय अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि राख के गुबार से विमानों की उड़ानों पर असर पड़ सकता है।
हालांकि मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि राख का फैलाव प्रशांत महासागर की ओर हुआ है और इसके रास्ते में कोई आबादी वाला इलाका नहीं है, जिससे जनहानि की आशंका नहीं है।
भूकंप के बाद बढ़ी थी आशंका
क्रशेनिनिकोव ज्वालामुखी में यह विस्फोट ऐसे समय हुआ है जब बीते सप्ताह कामचटका और आसपास के क्षेत्रों में 8.8 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, यह भूकंप इस क्षेत्र में कई सालों में दर्ज सबसे शक्तिशाली था। इसके बाद ही वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी गतिविधियों की आशंका जताई थी।
600 वर्षों बाद पहली बार हुआ विस्फोट
क्रशेनिनिकोव ज्वालामुखी का अंतिम ज्ञात विस्फोट 15वीं सदी के मध्य, यानी 1463 के आसपास माना जाता है। उसके बाद से इसे निष्क्रिय ही माना जा रहा था। अब 600 साल बाद इसमें फिर से गतिविधि देखी गई है, जिसे भू-वैज्ञानिक समुदाय एक महत्वपूर्ण घटना मान रहा है।
विशेषज्ञ निगरानी में जुटे
रूस की वोल्केनोलॉजिकल एजेंसियों ने इस विस्फोट के बाद क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है। वैज्ञानिक लगातार ज्वालामुखी से निकलने वाली गैसों, राख और भूगर्भीय हलचलों का अध्ययन कर रहे हैं। फिलहाल खतरे का स्तर “ऑरेंज” पर रखा गया है, जो हवाई यात्रा के लिए मध्यम जोखिम को दर्शाता है।
कोई जनहानि नहीं, लेकिन सतर्कता जारी
अब तक किसी तरह की जनहानि या संरचनात्मक क्षति की सूचना नहीं है। फिर भी स्थानीय प्रशासन और आपातकालीन सेवाएं अलर्ट पर हैं। आसपास के क्षेत्रों में निगरानी ड्रोन और सैटेलाइट के ज़रिए की जा रही है ताकि समय रहते चेतावनी जारी की जा सके।