अपने पांव खुद कुल्हाड़ी मारने वाली साबित हो सकती हैं ये मनमानी
सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
विशेष रूप से प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के एक ताकतवर शख्सियत के रूप में उभरने के बाद से भारत और अमेरिका के बीच संबंध वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी के रूप में चिन्हित हुए हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, आर्थिक सहयोग, और सुरक्षा गठजोड़ ने दोनों देशों को करीब लाया है। हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के चलते भारत के आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों को चूना लगाना शुरू कर दिया है। भारत के निर्यात पर 25-27% टैरिफ, चाबहार पोर्ट परियोजना पर दबाव, और अवैध प्रवासियों की वापसी जैसे कदम भारतीय हितों पर चोट के रूप में देखे जा रहे हैं। फिर भी, ट्रंप का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “बेहतरीन दोस्त” कहना और भारत-पाकिस्तान तनाव को कम करने की पेशकश एक जटिल कूटनीतिक परिदृश्य को रेखांकित करती है।
सवाल लाजिमी हैं- क्या ट्रंप के इरादे भारत के प्रति वास्तव में दोस्ताना हैं, या यह केवल एक लेन-देन वाली कूटनीति है? और क्या उनकी नीतियां न केवल भारत, बल्कि अमेरिका के भविष्य को भी कमजोर कर सकती हैं? यह आलेख इन सवालों का विश्लेषण करता है और इस द्विपक्षीय संबंध के भविष्य की पड़ताल करता है।
ट्रंप की नीतियां: भारत पर प्रभाव
आर्थिक टैरिफ और व्यापारिक चुनौतियां
ट्रंप प्रशासन की भारत सहित कई देशों के निर्यात पर 25-27% टैरिफ लगाने की घोषणा ने भारत के आर्थिक हितों पर सवाल उठाए हैं। यह नीति भारत के सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, और टेक्सटाइल्स जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है, जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं। ट्रंप ने भारत को “टैरिफ किंग” कहकर अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करने के लिए “निष्पक्ष और पारस्परिक” व्यापार की मांग की है। मूडीज जैसे विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यह नीति वैश्विक व्यापार को क्षेत्रीय समूहों में बांट सकती है, जिससे एक नई वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है।
हालांकि, भारत ने अभी तक जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय कूटनीतिक रास्ता चुना है। दोनों देश 2025 तक एक व्यापक व्यापार समझौते पर काम कर रहे हैं, और भारत ने अपने किसानों, मध्यम-लघु-सूक्ष्म एवं अति सूक्ष्म उद्यमों और उद्यमियों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी है। यह दृष्टिकोण भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक व्यापार में विविधीकरण की रणनीति को दर्शाता है।
चाबहार पोर्ट और भू-राजनीतिक दबाव
ट्रंप की ईरान पर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति ने भारत के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट को खतरे में डाल दिया है, जो मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक भारत की पहुंच के लिए महत्वपूर्ण है। यह परियोजना भारत-मध्य-पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) का हिस्सा है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए रणनीतिक रूप से अहम है। ट्रंप की नीति दर्शाती है कि अमेरिका अपने वैश्विक लक्ष्यों को प्राथमिकता देता है, भले ही इससे सहयोगी देशों के हितों को चोट पहुंचे।
अवैध प्रवासियों की वापसी
हाल ही में, अमेरिका ने 104 भारतीय अवैध प्रवासियों को सैन्य विमान से हथकड़ियां लगाकर वापस भेजा, जिसने भारत में तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया। इस घटना ने ट्रंप की नीतियों के प्रति भारत में आशावाद को कम किया है। यह कदम ट्रंप की सख्त आव्रजन नीति का हिस्सा है, जो अमेरिकी श्रम बाजार को प्राथमिकता देती है।
भारत-पाकिस्तान मध्यस्थता
ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान तनाव में मध्यस्थता की पेशकश की है, जिसे भारत ने इसे अपना आंतरिक मामला बताते हुए ठुकरा दिया। फिर भी, ट्रंप और मोदी की संयुक्त प्रेस वार्ता में मुंबई और पठानकोट हमलों के दोषियों को न्याय के कठघरे में लाने की बात उठी। यह दर्शाता है कि ट्रंप दक्षिण एशिया में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन भारत ने अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता को दृढ़ता से बनाए रखा है।
संदेश: ट्रंप की नीतियां भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियां पेश करती हैं। उनकी कथित दोस्ती की भाषा लेन-देन वाली कूटनीति का हिस्सा प्रतीत होती है, जो भारत को सतर्क और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
ट्रंप-मोदी की केमिस्ट्री: अवसरों का द्वार
ट्रंप और मोदी के बीच व्यक्तिगत संबंधों ने ‘हाउडी मोदी’ (2019) और ‘नमस्ते ट्रंप’ (2020) जैसे आयोजनों के माध्यम से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक माहौल को गर्मजोशी दी है। ट्रंप ने मोदी को “शानदार व्यक्ति” और भारत को “शानदार देश” कहा है, जबकि मोदी ने ट्रंप की नेतृत्व शैली की सराहना की है। दोनों नेताओं ने ‘मिशन 500’ का अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जिसका उद्देश्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 बिलियन डॉलर तक ले जाना है।
इसके अलावा, रक्षा, ऊर्जा, और प्रौद्योगिकी में सहयोग—जैसे वैश्विक क्षमता केंद्रों का विकास और अमेरिकी कंपनियों का भारत में निवेश—दोनों देशों के बीच साझेदारी की संभावनाओं को दर्शाता है। भारत और अमेरिका ने आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग को भी प्राथमिकता दी है, जिसमें पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों के लिए अपनी जमीन का उपयोग न करने देने की मांग शामिल है।
संदेश: ट्रंप और मोदी की व्यक्तिगत केमिस्ट्री भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, बशर्ते भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे।
ट्रंप की नीतियां और अमेरिका का भविष्य
ट्रंप की नीतियों का प्रभाव न केवल भारत, बल्कि अमेरिका के दीर्घकालिक भविष्य पर भी पड़ सकता है। उनकी संरक्षणवादी नीतियां—जैसे उच्च टैरिफ और एकतरफा भू-राजनीतिक कदम—वैश्विक व्यापार और सहयोग को बाधित कर सकती हैं। कुछ प्रमुख जोखिम इस प्रकार हैं:
आर्थिक प्रभाव: टैरिफ से आयातित सामान की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे अमेरिकी उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ेगा और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। जवाबी टैरिफ से अमेरिकी निर्यात प्रभावित हो सकता है, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान मैन्युफैक्चरिंग और नवाचार को कमजोर कर सकता है।
भू-राजनीतिक अलगाव: ट्रंप की नीतियां सहयोगी देशों के साथ तनाव बढ़ा सकती हैं, जिससे अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व की स्थिति कमजोर हो सकती है। भारत जैसे देश, जो रूस और अन्य गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हैं, वैकल्पिक गठजोड़ों की ओर बढ़ सकते हैं।
आंतरिक अशांति: ट्रंप की ध्रुवीकरण करने वाली शैली और सख्त आव्रजन नीतियां अमेरिका में सामाजिक और राजनीतिक तनाव को बढ़ा सकती हैं, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव अमेरिकी समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
संदेश: ट्रंप की नीतियां अल्पकालिक लाभ दे सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में ये वैश्विक मंदी और अमेरिका की नेतृत्व क्षमता को कमजोर करने का जोखिम उठाती हैं।
भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया
भारत ट्रंप की नीतियों का जवाब देने के लिए एक संतुलित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपना सकता है:
आर्थिक विविधीकरण: भारत यूरोप, आसियान, और मध्य पूर्व के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को बढ़ावा देकर अपने निर्यात बाजारों को विविध बना आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहन दे सकता है।
कूटनीतिक संतुलन: भारत ने रूस, कतर, और अन्य गैर-पश्चिमी देशों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को संतुलित किया है। यह भारत की ‘स्विंग-स्टेट’ स्थिति को मजबूत करता है।
रणनीतिक स्वायत्तता
चाबहार और आईएमईसी जैसी परियोजनाओं को बचाने के लिए भारत वैकल्पिक वित्तपोषण और कूटनीतिक रास्तों की तलाश कर सकता है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला:
ट्रंप की नीतियों से उत्पन्न अवसरों का लाभ उठाते हुए, भारत प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता है।
संदेश भारत की लचीली कूटनीति और आर्थिक रणनीति उसे ट्रंप की अप्रत्याशित नीतियों का सामना करने और अवसरों का लाभ उठाने में सक्षम बना सकती है।
वैश्विक और क्षेत्रीय निहितार्थ
हिंद-प्रशांत रणनीति
भारत और अमेरिका का रणनीतिक संरेखण(Strategic Alignment) हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों देशों ने आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर सहयोग बढ़ाने का वादा किया है, जो दक्षिण एशिया में स्थिरता के लिए अहम है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला
ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियां वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकती हैं, लेकिन भारत को इसका लाभ मिल सकता है। मूडीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका-चीन तनाव के कारण भारत और आसियान देशों को निवेश और व्यापार के नए अवसर मिल सकते हैं।
संदेश: भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति को मजबूत करे और वैश्विक शक्ति के रूप में उभरे।
निष्कर्ष: एक जटिल कूटनीतिक कसरत
ट्रंप की नीतियां और मोदी की कूटनीति के बीच का यह तनाव एक जटिल कूटनीतिक कसरत को दर्शाता है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति भारत के लिए चुनौतियां लाती है, लेकिन यह भारत को अपनी आर्थिक और भू-राजनीतिक रणनीति को पुनर्परिभाषित करने का अवसर भी देती है। ट्रंप के इरादे पूरी तरह से स्वार्थरहित नहीं हैं; उनकी दोस्ती की भाषा लेन-देन वाली कूटनीति का हिस्सा है। साथ ही उनकी संरक्षणवादी नीतियां न केवल भारत, बल्कि अमेरिका के दीर्घकालिक भविष्य के लिए भी जोखिम पैदा करती हैं और उसके लिये अपने पांव कुल्हाड़ी मारने वाली साबित हो सकती हैं।