आइजोल। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने चम्फाई जिले के लियान्पुई गांव में स्थित प्राचीन मेगालिथिक स्थल ‘लुंग्फुन रोपुई’ को **राष्ट्रीय महत्व का स्मारक** घोषित किया है। यह मिजोरम में दूसरा स्थल है, जो इस प्रतिष्ठित दर्जे को प्राप्त कर चुका है, इससे पहले चम्फाई जिले के वांग्छिया में कावत्छुआह रोपुई को यह मान्यता मिली थी।
लियान्पुई की सांस्कृतिक धरोहर
लियान्पुई, चम्फाई शहर से लगभग 54 किमी दक्षिण-पूर्व में भारत-म्यांमार सीमा के निकट एक छोटा सा पहाड़ी गांव है। इस स्थल पर प्राचीन मेन्हिर (खड़े पत्थर) मौजूद हैं, जिन पर मानव आकृतियों, पक्षियों, जानवरों, मिथुन के सिर, गोंग, और छिपकलियों जैसे प्री-क्रिश्चियन मिजो प्रतीकों की नक्काशी की गई है। ये नक्काशियां मिजो समुदाय की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक प्रथाओं की झलक पेश करती हैं। 114 मेन्हिरों को आठ पंक्तियों में व्यवस्थित किया गया है—चार उत्तर-दक्षिण और चार पूर्व-पश्चिम दिशा में, जो संभवतः एक औपचारिक व्यवस्था को दर्शाता है।
लियान्पुई को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देने की प्रक्रिया वर्ष 2021 में गजट ऑफ इंडिया में प्रारंभिक अधिसूचना के साथ शुरू हुई थी। 7 जुलाई 2025 को एएसआई के निदेशक (स्मारक) ए.एम.वी. सुब्रमण्यम ने गांव का दौरा कर अंतिम औपचारिकताओं की पुष्टि की। दो महीने की सार्वजनिक अधिसूचना अवधि में कोई आपत्ति नहीं मिलने के बाद अब इसे आधिकारिक रूप से प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
संरक्षण और पर्यटन की नई संभावनाएं
इस मान्यता के साथ, लुंग्फुन रोपुई को अब केंद्र सरकार के तहत संरक्षण और संवर्द्धन के लिए धन प्राप्त होगा। एएसआई ने स्थल को संरक्षित करने और पुरातात्विक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बाड़, पैदल मार्ग, शौचालय, और पेयजल सुविधाओं के विकास की योजना बनाई है। मिजोरम की कला और संस्कृति विभाग की निदेशक कैरल वीएलएमएस डावंगकिमी ने इस उपलब्धि को स्वर्गीय श्री पी. रोहमिंगथांगा, आईएएस (सेवानिवृत्त) को समर्पित किया, जिन्होंने इस दिशा में अथक प्रयास किए।
मिजोरम के पुरातात्विक परिदृश्य में योगदान:
लियान्पुई का यह स्थल मिजोरम के समृद्ध पुरातात्विक इतिहास को उजागर करता है, जो वांग्छिया के कावत्छुआह रोपुई के बाद दूसरा राष्ट्रीय महत्व का स्मारक बन गया है। वांग्छिया में 171 नक्काशीदार मेन्हिर हैं, जो योद्धाओं, शिकार, संगीत, और सामुदायिक किंवदंतियों के दृश्यों को दर्शाते हैं। लियान्पुई की यह मान्यता न केवल मिजो संस्कृति की प्राचीनता को रेखांकित करती है, बल्कि मिजोरम को भारत के पुरातात्विक नक्शे पर और मजबूती से स्थापित करती है।
मिजोरम के इतिहास और संस्कृति के लिए यह एक गर्व का क्षण है। इस मान्यता से न केवल लियान्पुई बल्कि डुंग्त्लांग, फरकॉन, और लुंग्फुन्लियन जैसे अन्य स्थलों पर भी ध्यान केंद्रित करने की मांग उठ रही है। यह कदम मिजोरम की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और वैश्विक स्तर पर इसके महत्व को उजागर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।