सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
इजरायल-ईरान युद्ध में अमेरिका के सीधे हस्तक्षेप और ईरान के परमाणु ठिकानों—फोर्डो, नतांज, और इस्फहान—पर हमलों ने न केवल पश्चिम एशिया को युद्ध के कगार पर खड़ा कर दिया है, अपितु भारत खासतौर से जम्मू-कश्मीर के अंदर आतंकी हमलों की वृद्धि की आशंका भी खड़ी कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इन हमलों को ईरान के परमाणु हथियार विकास को रोकने के लिए जरूरी बताया है, लेकिन ईरान की जवाबी धमकियों और उसके सहयोगियों—चीन और पाकिस्तान—की संभावित भूमिका ने वैश्विक तनाव को बढ़ा दिया है। विशेष रूप से, पाकिस्तान द्वारा ईरान को परमाणु बम सहायता की अटकलों ने भारत के लिए गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। प्रस्तुत है एक सामयिक विश्लेषण।
सैन्य रणनीति: अमेरिका और इजरायल की ताकत
अमेरिकी हस्तक्षेप:
22 जून 2025 को, अमेरिका ने B-2 स्टील्थ बॉम्बर्स और GBU-57 बंकर बस्टर बमों के साथ ईरान के परमाणु ठिकानों पर सटीक हमले किए। खाड़ी क्षेत्र में तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस हैरी ट्रूमैन विमानवाहक पोतों ने सैकड़ों फाइटर जेट्स और क्रूज मिसाइलों के साथ सहयोग किया। क्षेत्र में 40,000 से अधिक अमेरिकी सैनिक कतर, बहरीन, और सऊदी अरब में तैनात हैं।
इजरायल ने खुफिया जानकारी और समन्वय के जरिए सहयोग किया। उसकी वायु रक्षा प्रणालियां—एरो, डेविड्स स्लिंग, और आयरन डोम—जवाबी हमलों के लिए तैयार हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इन हमलों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को दो-तीन साल पीछे धकेल दिया है।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, जिससे तेल की कीमतें 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
ईरान की युद्ध रणनीति: क्षेत्रीय अस्थिरता का हथियार
ईरान, जो पारंपरिक सैन्य शक्ति में कमजोर है, असममित युद्ध रणनीति पर निर्भर करता है। यह रणनीति गैर-पारंपरिक तरीकों, जैसे प्रॉक्सी युद्ध और सस्ते हथियारों, के जरिए दुश्मन को उलझाने पर केंद्रित है।
प्रॉक्सी युद्ध:
हिजबुल्लाह (लेबनान): 1,50,000 रॉकेट्स और मिसाइलों के साथ इजरायल पर हमले की क्षमता रखता है।
हूती विद्रोही (यमन): सऊदी अरब और यूएई के तेल ढांचों पर ड्रोन और मिसाइल हमले कर सकते हैं।
इराकी मिलिशिया (पीएमएफ): इराक में अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर सकता है।
सस्ते हथियार:
शाहेद-136 ड्रोन्स और शहाब-3 बैलिस्टिक मिसाइलें सस्ती लेकिन प्रभावी हैं, जो महंगी रक्षा प्रणालियों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज:
ईरान की नौसेना तेल टैंकरों को निशाना बना सकती है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होगी।
साइबर हमले:
अमेरिकी और इजरायली बुनियादी ढांचों पर साइबर हमले की संभावना।
सीमाएं:
ईरान की हवाई रक्षा प्रणालियां अमेरिकी स्टील्थ तकनीक के सामने कमजोर हैं, और उसकी अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से दबाव में है। फिर भी, असममित रणनीति क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ा सकती है।
चीन और पाकिस्तान की भूमिका: परमाणु जोखिम और भारत पर खतरा
चीन ने अमेरिका के हमलों की निंदा की और कूटनीतिक मध्यस्थता की पेशकश की। ईरान उसका प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता है, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिरता उसके 40% तेल आयात के लिए महत्वपूर्ण है।
सैन्य समर्थन: चीन ने ईरान को ड्रोन और मिसाइल तकनीक दी है। युद्ध बढ़ने पर वह हथियारों की आपूर्ति बढ़ा सकता है, लेकिन सीधा सैन्य हस्तक्षेप असंभावित है।
परमाणु समर्थन: परमाणु हथियार देना एनपीटी का उल्लंघन होगा, लेकिन तकनीकी सहायता या परमाणु सामग्री की अप्रत्यक्ष आपूर्ति संभव है।
पाकिस्तान की स्थिति और परमाणु जोखिम:
पाकिस्तान और ईरान के बीच हाल के वर्षों में व्यापार और ऊर्जा सहयोग (जैसे ग्वादर पाइपलाइन) बढ़ा है।
सैन्य समर्थन: पाकिस्तान ने ईरान को छोटे हथियार और खुफिया जानकारी साझा की है।
परमाणु खतरा: अटकलें हैं कि पाकिस्तान संकट में ईरान को परमाणु तकनीक या सामग्री दे सकता है। यह अत्यंत जोखिम भरा होगा, क्योंकि इससे वैश्विक प्रतिबंध और भारत-अमेरिका गठजोड़ का जवाबी दबाव बढ़ेगा।
पाकिस्तान द्वारा ईरान को परमाणु सहायता देने की स्थिति में भारत-पाक तनाव चरम पर पहुंच सकता है। पाकिस्तान इस अवसर का उपयोग जम्मू-कश्मीर में प्रॉक्सी युद्ध को तेज करने के लिए कर सकता है।
ऐतिहासिक रूप से, पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी समूहों को समर्थन दिया है। युद्ध की अस्थिरता में ये समूह, पुलवामा हमले की तर्ज पर, सीमापार आतंकी हमले बढ़ा सकते हैं।
ईरान के प्रॉक्सी समूहों (जैसे हिजबुल्लाह) से तकनीकी सहायता या प्रशिक्षण मिलने की स्थिति में कश्मीर में आतंकी गतिविधियां और परिष्कृत हो सकती हैं, जैसे ड्रोन हमले या साइबर युद्ध।
भारत की खुफिया एजेंसियों ने पहले ही सीमा पर बढ़ती गतिविधियों की चेतावनी दी है। युद्ध बढ़ने पर नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ और आतंकी हमलों में वृद्धि की आशंका है।
लेकिन पाकिस्तान की कुछ बाध्यताएं भी हैं। वो सऊदी अरब का भी सहयोगी है, जो ईरान का विरोधी है। इससे उसकी स्थिति जटिल है। परमाणु सहायता देने का निर्णय पाकिस्तान को वैश्विक अलगाव और भारत के साथ युद्ध के जोखिम में डाल सकता है।
अमेरिका का रुख:
ट्रम्प ने दो हफ्तों में सैन्य कार्रवाई या कूटनीति पर फैसला लेने की बात कही। अमेरिका ईरान को परमाणु कार्यक्रम बंद करने के बदले प्रतिबंधों में छूट की पेशकश कर सकता है।
सऊदी अरब और इजरायल के साथ नया क्षेत्रीय समझौता भी हो सकता है।
ईरान ने हमले रोकने और प्रतिबंध हटाने की मांग की। उसने चीन, रूस, तुर्की, और कतर से मध्यस्थता की अपील की।
वैश्विक मध्यस्थता:
चीन: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिरता के लिए मध्यस्थता।
रूस: यूक्रेन युद्ध के कारण सीमित भूमिका।
तटस्थ देश: तुर्की, कतर, और ओमान मध्यस्थता कर सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र: वीटो के कारण ठोस कदम मुश्किल है।
चुनौतियां:
अमेरिका-ईरान अविश्वास, क्षेत्रीय सहयोगियों का नियंत्रण, और वैश्विक शक्तियों की सीमित भागीदारी।
भारत पर प्रभाव: आर्थिक, सामरिक, और आतंकी खतरे
भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान से तेल कीमतें बढ़ेंगी, जिससे भारत में मुद्रास्फीति और ईंधन कीमतें प्रभावित होंगी।
युद्ध से आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी, जिसका असर भारत के निर्यात पर पड़ेगा।
खाड़ी में 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और स्वदेश वापसी चुनौती होगी।
चीन का ईरान समर्थन भारत-चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव को बढ़ा सकता है।
पाकिस्तान का परमाणु सहायता देने का कदम भारत-पाक युद्ध को भड़का सकता है।
भारत का अमेरिका और क्वाड के साथ गठजोड़ मजबूत है, लेकिन तटस्थता बनाए रखने से यह प्रभावित हो सकता है। सऊदी अरब और यूएई के साथ संबंध बनाए रखना जटिल होगा।
पाकिस्तान की ईरान को परमाणु सहायता की स्थिति में भारत के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध तेज हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकी समूहों को हथियार, प्रशिक्षण, या ड्रोन तकनीक मिलने की आशंका है।
ईरान के प्रॉक्सी समूहों, जैसे हिजबुल्लाह, से तकनीकी सहायता आतंकी हमलों को और परिष्कृत कर सकती है।
नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ और ड्रोन हमलों में वृद्धि की संभावना बढ़ सकती है, जैसा कि हाल के वर्षों में देखा गया था।
भारत की सेना और खुफिया एजेंसियों को सतर्कता बढ़ानी होगी, खासकर सीमा पर ड्रोन रोधी प्रणालियों और साइबर सुरक्षा को मजबूत करना होगा।
पाकिस्तान द्वारा ईरान को परमाणु सहायता दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ को बढ़ाएगी। ऐसी हालत में भारत को जमीन, हवा और समुद्र में अपनी परमाणु त्रिकोणीय रणनीति को और मजबूत करना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर अमेरिका-ईरान युद्ध ने वैश्विक स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। ईरान की असममित रणनीति और चीन-पाकिस्तान का समर्थन युद्ध को जटिल बना रहा है। भारत के लिए यह युद्ध आर्थिक (तेल कीमतें), सामरिक (चीन-पाक गठजोड़), और आतंकी (जम्मू-कश्मीर में खतरा) चुनौतियां ला रहा है। पाकिस्तान द्वारा ईरान को परमाणु सहायता की संभावना न केवल भारत-पाक तनाव को बढ़ाएगी, बल्कि जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को और भड़का सकती है।असावधानी हटी दुर्घटना घटी।
