अल्मोड़ा सीट पर खामोश मतदान के बाद सियासी गुणा भाग पर जोर

अल्मोड़ा । सीमांत क्षेत्र में बढ़ते पलायन की समस्या, बेरोजगारी, मूलभूत संसा का अभाव लगातार आम जन मानस को अखरता रहा है। जिसकी परिणती रहीं कि निर्वाचन आयोग की ओर से मतदान प्रतिशत बढ़ाने को लेकर चलाये जाने वाले जागरूकता अभियान भी नाकाफी साबित हुये।

इस बार अल्मोड़ा संसदीय सीट पर मतदान 45.17 फीसदी पर सिमट गया। इससे कम मतदान 25 वर्ष पहले 1919 के लोकसभा चुनावों में महज 41.82 प्रतिशत हुआ था। अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चार जिलों के सभी 14 में से 13 विधानसभाओं में बीते 219 के चुनाव के मुकाबले कम मतदान रहा। केवल चंपावत विस क्षेत्र में मतप्रतिशत में बढ़तरी देखने को मिली। पहाड़में मतदान प्रतिशत के कम होने के पीछे बहुत से कारण है। सबसे बड़ा कारणों में विषम भौगोलिक परिस्थितियां, सहालग सीजन और दलों का घर-घर ना जाकर केवल आभासी प्रचार करना, जनप्रतिनिधियों की ओर से स्थानीय मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह देना शामिल रहा।

अल्मोड़ा संसदीय सीट पर मतदान का प्रतिशत कम होना यह कोई नई बात नहीं है। 1952 के बाद से यहां के संसदीय चुनावों के इतिहास पर गौर करें तो दो चुनाव वर्ष 2014 व 19 के लोकसभा चुनाव ही ऐसे थे जिनमें मतदान 50 प्रतिशत से ऊपर गया। उससे पहले के चुनावों में मतदान प्रतिशत लगभग इतना ही रहा। इन दो चुनावों में मोदी मैजिक के कारण मतदान प्रतिशत में थोड़ी बढ़ोतरी हुईं।

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