उत्तरकाशी की घटना प्रकृति और विज्ञान की लड़ाई

 अतुल सिंघल

मशीन में संवेदना नहीं होती। मशीन मनुष्य नहीं होती मगर मनुष्य जरूर मशीन होता जा रहा है। प्रकृति से विज्ञान कभी नहीं जीत सकती। प्रकृति से परंपरागत तकनीकी एवं हनुर के जरिए सहायता पाई जा सकती है। उत्तरकाशी ( Uttarkashi )के सिलक्यारा की सुरंग में फंसे 41 मजदूर सुरक्षित बाहर आ गए। सारे देश के लिए यह बहुत बड़ी राहत की बात है। 41 मजदूरों ने 17 दिन तक जिस तरह से सुरंग में अपना जीवन बिताया वह उनके हौसले और हुनर की बदौलत संभव हुआ। सभी मजदूर ग्रामीण परिवेश से जुड़े थे और प्रकृति के साथ उनका सीधा संबंध था।

सुरंग में उन्होंने जिस हौसले और आत्मबल का परिचय दिया वह इस कारण संभव हुआ कि सभी श्रमिकों को इस तरह के वातावरण से इसलिए परेशानी नहीं हुई कि वह प्रकृति के इस तरह के प्रकोप के प्रति सचेत थे। अगर इस तरह शहरी परिवेश से जुड़े लोग फंसे होते तो उन्हें रक्तचाप, घबराहट, तनाव, अनिद्रा, चक्कर आना, उल्टियां, हृदयरोग, सिरदर्द और भूख न लगने जैसी बीमारियां पहले दिन से ही शुरू हो जाती।
ग्रामीँण परिवेश से जुड़े सभी श्रमिक बहुत सारी शारीरिक बीमारियों से दूर थे। 17 दिनों तक उन्होंने सुरंग में टहलकर, बातचीत कर, कीर्तनभजन कर, हंसी ठहाके लगा कर बीता दिए। इसी बीच उन्हें बाहर निकालने के लिए दुनियाभर के विशेषज्ञ और भीमकाय मशीने जुटी रही। अमेरिकी मशीन भी कई दिनों की मेहनत के बाद परास्त हो गई। जिसके बाद उत्तरकाशी के ग्रामीणों का अनुभव और राय ही काम आई। सुंरग के ऊपर से भी ड्रीलिंग का काम शुरू हुआ और मजदूरों के साथ बातचीत को लगातार कायम रखा गया। उत्तरकाशी के सिलक्यारा का यह ऑपरेशन प्रकृति और विज्ञान के बीच की लड़ाई के रूप में सामने आया। समूचे उत्तराखंड को सुरंग और बिजलीघरों के सयंत्रों से छेद कर रख दिया। जिन पहाड़ों के बीच हमारे पूर्वजों ने प्राकृतिक गुफाओं का निर्माण किया था उन्हें मशीनों ने भेद डाला। सुगमता के लिए सुरंगों को प्रकृति की अनदेखी करके बनाया जाना इस बात का संकेत है कि सिलक्यारा जैसी घटनाएं भविष्य में कहीं भी हो सकती हैं।
पहाड़ों के सफर को आसान बनाने के लिए और भी बहुत सी तकनीकी और विशेषज्ञता है जहां बिजलीघरों की जरूरत नहीं है वहां भी बिजलीघरों का निर्माण क्यों हो रहा है। पहाड़ उजड़ रहे है। प्रकृति और उसके रक्षकों को उजाड़ा जा रहा है।

सिलक्यारा सुरंग से 41कर्मवीर बाहर आ गए इसके लिए प्रकृति को ही धन्यवाद देना चाहिए। अगर मौसम साथ नहीं देता तो इतना बड़ा ऑपरेशन सफल नहीं होता। मौसम और परंपरागत तौर तरीकों के बाद ही कर्मवीर बाहर आ पाए है। अन्यथा कोई भी बड़ी अनहोनी हो सकती थी। यह बात सही है कि सड़कों का विकास मानव की तरक्की के लिए जरूरी है, मगर इसके और भी विकल्प है जिन पर दुनिया के अनेक देश काम कर रहे है। हमारे यहां भी उन पर गौर होना जाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राज्यपाल असम के पूर्व मीडिया सलाहकार हैं।)

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