गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः

शिक्षक दिवस पर

डॉ. श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
शिक्षक के सम्मान की
फिर होने लगी है बात
लेकिन शिक्षक त्रस्त है
जख्मी है जज्बात
समाज मे सम्मान से
है शिक्षक महरूम
वेतनभोगी मानने लगे
इज्जत चकनाचूर
बेरोजगार शिक्षक की
हालत बहुत खराब
सरकार से मांगे नोकरी
करती खाकी उनपर वार
पढ़वाना उनसे छोड़कर
बनवाने लगे है खाना
कभी जनसंख्या गिनवाए
कभी वोटर कार्ड बनवाना
प्लस पोलियो ड्रॉप्स पिलाने
घर घर जाये मास्टर जी
गुरु शिष्य के सम्बन्धो का
दिवाला तक निकल गया जी।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय ( Prajapita Brahmakumaris Ishwariya University) एक ऐसी अनूठी आध्यात्म ज्ञान और चरित्र निर्माण की  शिक्षण संस्था  है जहां प्रतिदिन स्वयंं परमात्मा ही पढ़ाते है।जो पाठ प्रतिदिन ब्रह्माकुमारीज के 140 देशों में फैले साढ़े आठ हजार सेवा केंद्रों पर परमात्म निमित्त भाई बहनों द्वारा पढाया जाता है, उसे ईश्वरीय वाणी ही कहा जाता है। इस मुरली रूपी पाठ मे परमात्मा ( Supreme Soul) सीधे अपने बच्चो अर्थात इस संगम युगी आत्माओ से संवाद करते है ।यह मुरली विभिन्न भाषाओ मे छपकर दुनिया के 140देशो मे एक साथ प्रसारित होती है।मुरली की भाषा कोई भी हो लेकिन सबमे विचार एक ही होता है ।मजेदार बात यह भी है कि यह मुरली प्राय दुनिया मे सब जगह स्थानीय समय के अनुसार सुबह, दोपहर, शाम एक ही समय पर पढ़ी व सुनाई जाती है ।यह मुरली जो कि चार पृष्ठों मे समाहित होती है, मे जीवन की हर समस्या का समाधान भी सहज ही मिल जाता है ऋयदि आप रोज मुरली सुनते या पढ़ते है तो आपके मन मे कोई भी शंका, समस्या, प्रश्न पैदा होता है तो उसका उत्तर आपको हर हालत मे मुरली के अंदर ही मिल जाएगा ।इसके लिए अलग से किसी शिक्षक, गुरु, संत, महात्मा के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।मुरली मे पांचो विकारो से मुक्ति के उपाय सुझाये जाते है तो इन विकारो को छोड़ने के लिए प्रेरित भी किया जाता है । सबसे बड़ी बात यह है कि मुरली किसी धर्म विशेष का प्रचार नहीं करती, मुरली मे हिन्दू सनातन ( Hindu Sanatan) , मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध  आदि धर्मों की विशेषताओं और उनके प्रति सम्मान भी अभिव्यक्त किया जाता है ।तभी तो इस संस्था मे सभी धर्मों से जुड़े लोग श्रद्धा भाव के साथ दौड़े चले आते है ।दरअसल मुरली हमें वास्तविक गीता का ज्ञान देती है, जो परमात्मा शिव के द्वारा रचित है।इस मुरली मे हर रोज नए विषय पर ज्ञान चर्चा होती है और मनुष्य के आदि, मध्य, अंत के बारे मे बताया जाता है ।वास्तव मे मनुष्य है क्या? वह कहा से आता है, कहा चला जाता है ।परमात्मा कौन है, उसका क्या स्वरूप है, परमात्मा का आत्मा से क्या संबंध है ।आत्मा हमारे शरीर मे कहा रहती है ।शरीर के बजाए आत्म स्वरूप मे रहने के क्या फायदे है ।परमात्मा को याद करना क्यों जरूरी है, परमात्मा को याद करने की उत्तम विधि क्या है. हम हर समय सामान्य कामकाज करते हुए व गृहस्थ मे रहकर भी संत समान कैसे रह सकते है, इन सब पर मुरली मे पढ़ने व सुनने को मिलता है ।सबसे बड़ी बात मुरली मे यह है कि जो व्यक्ति नियमित मुरली सुनता है या फिर पढ़ता है वह शंकाओ और दुविधाओ से दूर हो जाता है ।उसके मन मे व्यर्थ के विचार आने कम हो जाते है और उसकी अच्छा सोचने व अच्छा करने की शक्ति पढ़ जाती है ।मुरली सुनना भी एक प्रकार का नशा है जिसे हम ईश्वरीय प्रेम का नशा भी कह सकते है । मुरली से  अंहकार से मुक्ति मिल जाती है ।व्यक्ति निरहंकार युक्त जीवन जीने मे आनंद प्राप्त करता है ।चूंकि मुरली सीधे सीधे ईश्वरीय वाणी है इसलिए उसमे दिये संदेशो को परमात्मा का संदेश मानकर लोग अपने जीवन को शांतिमय व सुखमय बना लेते है ।
मुरली केवल ब्रह्माकुमारीज सेवा केन्द्रो पर संस्था से जुड़े लोगो के लिए ही उपलब्ध नहीं बल्कि जनसामान्य के लिए भी नेट पर, पीस आफ माइंड चैनल पर, रेडियो मधुबन पर, वाहट्स ऐप पर, फेसबुक पर मौजूद रहती है ।लेकिन मुरली की संवाद भाषा थोड़ी अलग है इसलिए इसे सुनने व पढ़ने से पहले यदि ब्रह्माकुमारीज संस्था द्वारा निशुल्क संचालित सात दिन का आध्यात्मिक ज्ञान पाठ्यक्रम पूरा कर लिया जाए तो मुरली सहजता से समझ आने लगेगी और जीवन को सफल बनाने मे मदद मिल जायेगी ।
हमारा सबसे बड़ा गुरु परमपिता परमात्मा शिव हैं जिन्हें हम अलग-अलग नामों के साथ याद करते हैं। परमात्मा एक है और आत्मा उस स’चे परमपिता परमात्मा की संतान है। उन्होंने कहा कि वर्तमान काल में प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय यही सेवा कर रहा है कि हर एक आत्मा परमात्मा को पहचान कर अपना तीसरा नेत्र खोले और परमात्मा के सिवाए कोई मानवीय आत्मा किसी का भी तीसरा नेत्र नहीं खोल सकती।
संसार में गुरुओं के बारे में जो दावे किए जाते हैं कि वह अपने भक्तों के सभी पापों को खत्म करने में सक्षम होते हैं एवं सभी देवताओं के ऊपर हैं इत्यादि, यह सभी दावे केवल उस एक सतगुरु परमात्मा के लिए ही किए जा सकते हैं, न कि किसी देहधारी के लिए क्योंकि अन्य सभी तो हमारे जैसे नश्वर प्राणी हैं जो समय और प्रकृति की सीमाओं से बंधे हुए हैं। अत: वे एक सीमित हद तक ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। दूसरा किसी अन्य व्यक्ति के पापों को खत्म करने की अवधारणा कर्म के कानून के विपरीत है क्योंकि उसके अनुसार हर आत्मा को उसके कर्मानुसार फल की प्राप्ति होती है। अत: पापियों के पाप यदि कोई हर सकता है तो वह केवल एक सतगुरु परमात्मा ही हैं जो गुरुओं के भी गुरु हैं।
वर्तमान समय में नकारात्मक माहौल और भावनाओं ने सभी के मन के ऊपर अपना साम्राज्य बना लिया है, जिसके फलस्वरूप सभी मनुष्य आत्माएं धर्म की छत्रछाया में एक स्थाई शरण खोजने में असमर्थ हो रही हैं। यह लक्षण उस शुभ घड़ी की ओर इशारा कर रहे हैं, जब ‘सर्वोच्च सत्ता परमात्मा स्वयं मार्गदर्शक के रूप में हम सभी आत्माओं का मार्गदर्शन करने आएंगे और जीवन मुक्ति के पथ की ओर चलने की हमारी यात्रा का नेतृत्व करेंगे।गुरु-शिष्य परंपरा तो हमारी संस्कृति की पहचान है। हमारे देश में शिक्षक अर्थात गुरु को तो भगवान से भी बढ कर बताया गया है। संस्कृत का यह श्लोक दर्शाता है कि प्राचीन काल से ही भारत में गुरुजनों को कितना सम्मान दिया जाता रहा है:
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
अर्थात्:  गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात परमब्रह्म अर्थात परमात्मा शिव हैं; ऐसे गुरु का मैं नमन करता हूँ।
आज शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से बदल चुकी है, जहाँ पहले गुरुकुल प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा दी जाती थी वहीँ आज ई लर्निग का चलन आ चूका है। आज हम डिजिटल इंडिया में प्रवेश कर चुके हैं, जिसका असर हमारी शिक्षा प्रणाली पर भी पड़ा है। घर बैठे सात समुंदर पार के शिक्षक भी हमारे शैक्षणिक विकास में सहयोग दे रहे हैं। किन्तु आधुनिकता और नई तकनिकी के इस दौर में हमारे शिक्षकों की भूमिका पर शिक्षक दिवस का महत्त्व क्या है इस पर विचार करना भी आज की प्रासंगिता है क्योंकि आज जहाँ एक तरफ हमारे साक्षरता की दर बढ़ रही हैं वहीँ  दूसरी तरफ समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है।आज देश में बढती अराजकता के लिये कहीं न कहीं हमारी शैक्षणिक व्यवस्था भी जिम्मेदार है। बाल्यवस्था की शिक्षा वह नीव है जहाँ  आध्यात्मिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का बीज भी रोपित किया जाता है, जिससे बचपन से ही बच्चे सामाजिक मूल्यों को समझ सकें। परंतु हमारे देश की ये कड़वी सच्चाई है कि प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की अुनपस्थिती तथा बुनियादी शैक्षणिक ढांचे में बहुत कमी है। आज उच्च गुणंवत्ता वाली शिक्षा के लिये अधिक फीस देनी पड़ती है, जो सामान्य वर्ग के लिये एक सपना होती है। लिहाज़ा एक बहुत बड़ा बच्चों का वर्ग उचित शिक्षा के अभाव में रास्ता भटक जाता है। कई जगहों पर तो नकल से पास कराने में शिक्षक इस तरह सहयोग करते हैंं कि, बच्चों के मन में उनके प्रति सम्मान न रहकर एक व्यवसायी की तस्वीर घर कर जाती है।
आज शिक्षा, सेवाभाव के दायरे से निकलकर आर्थिक दृष्टी से लाभ कमाने की ओर अग्रसर है। जबकी शिक्षकों की जिम्मेदारी तो इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनको  बच्चों के सामने ऐसा आदर्श बनकर प्रस्तुत होना होता है, जिसका अनुसरण करके छात्र/छात्राओं का शैक्षणिक विकास ही नही अपितु नैतिक विकास भी सार्थकता की ओर पल्लवित हो।
हमारे देश में प्रतिभावान विद्यार्थियों की कोई कमी नही है जरूरत है उन्हे तराशने और मूल्य आधारित शिक्षा के प्रकाश से अवलोकित करने की है।कबीर के शब्दों में, गुरु कुम्हार और शिष्य कुंभ है, गढी-गढी काढै खोट ।
 अंतर हांथ सहार दे, बाहर बाहै चोट।।  अर्थात: शिक्षक तो कुम्हार के समान है, जो अपने शिष्य को ऐसे तराशता है जिससे उसके मन में कोई भी बुराई न रह जाये और इस दौरान शिक्षक का मर्मस्पर्शी व्यवहार उसे भावनात्मक बल भी देता है।
ओर अंत मे,
शिक्षक दिवस पर लो संकल्प
शिक्षा अलख जगाने का
स्कूल कोई बन्द न हो
लक्ष्य हो स्कूल जाने का
स्कूल से वंचित है जो बच्चे
उन्हें खोज निकालो तुम
शिक्षक धर्म निभाओ अपना
ऐसे बच्चों को पढ़ाकर तुम
चरित्र तुम्हारा हो उज्ज्वल
बच्चों को प्रेरणा मिले तुमसे
नई पीढ़ी के संवाहक बनो
समाज भी नाज् करे तुमपे
बधाई तुम्हे हे शिक्षक वृंद
राधा कृष्णन के वारिस बनो
लोक कल्याण होता रहे आपसे
ऐसे राष्ट्र अनुगामी बनो।

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