महंगाई ठिठकी पर चुनौती बरकरार

  • रिजर्व बैंक ने इस साल दूसरी दफा रेपो रेट में बदलाव न कर सबको चौंकाया
  • मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई 5.1 फीसद रहने का अनुमान

आलोक भदौरिया

नई दिल्ली।रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस साल दूसरी दफा रेपो रेट में बदलाव न कर सबको चौंका दिया। बाजार कयास लगाए बैठा था कि कुछ तो कटौती जरूर होगी। हैरत की बात है कि महंगाई अब तक रिजर्व बैंक के पूरे नियंत्रण में नहीं आई है। कुछ समय के लिए भले ही यह छह फीसद से नीचे आई थी।

लेकिन, अमूमन इसकी चाल ऊपर की ओर ही ज्यादातर दिखाई देती रही। थोड़ी नरमी जरूर आई, पर क्या महंगाई अब उतना प्रमुख मुद्दा नहीं रह गया है? क्या लोग अब महंगाई के आदी हो गए हैं? या सरकार को जनता की परेशानियों को लेकर ज्यादा चिंता नहीं सताती?
बड़ी दिक्कत यह है कि अब महंगाई के छह फीसद से थोड़ा नीचे आने पर ही केंद्र सरकार राहत की सांस लेने लगती है। पांच-छह फीसद के इर्द गिर्द आने पर महंगाई की चाल नीचे की तरफ होने की बातें होने लगती हैं। याद करें कि पिछले साल नवंबर और दिसंबर में ही खुदरा महंगाई (सीपीआई) छह फीसद से नीचे आई थी। यह 11 महीनों से छह फीसद से ऊपर चल रही थी। दो महीनों की सुस्ती के बाद इस साल इसने फिर बढ़ना शुरू किया।

जनवरी में यह 6.52 फीसद और फरवरी में 6.4 फीसद के स्तर पर पहुंच गई। लेकिन बाद में इसमें तेजी से गिरावट दर्ज की गई।
रिजर्व बैंक ने हालांकि महंगाई को लेकर चिंता जरूर जताई है। यह उसके बर्दाश्त की ऊपरी सीमा चार फीसद से फिर भी अधिक है। मौजूदा वित्त वर्ष में महंगाई के बारे में अनुमान है कि यह 5.1 फीसद रह सकती है। उसका मंसूबा खुदरा महंगाई को आदर्श स्थिति में चार फीसद दायरे में रखना होता है। इसके बावजूद रेपो रेट में कोई बदलाव न होना क्या संकेत देता है?
समस्या को सिरे से समझने के लिए केंद्रीय बैंक के आकलन के बारे में ही बात की जाए। यह उसका अनुमान भर है। लेकिन, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थान अंदेशा जता चुके हैं कि यह साल दुनिया के लिए चुनौतीपूर्ण होने वाला है। मंदी आनी ही है। दुनिया की विकास दर में गिरावट तय है। खाद्यान्न संकट टलने के आसार नहीं हैं। यही वजह है कि अमेरिकी फेडरल बैंक ने ब्याज दरों में इजाफे का सिलसिला बरकरार रखा।

यह जरूर है कि पिछली दफा ब्याज दरें महज चैथाई प्रतिशत बढ़ाई। इसके मुखिया जेरोम पॉअल ने साफ कहा कि महंगाई को दो फीसद तक लाना ही पड़ेगा। काबिलेगौर है कि तीन बैंकों के फेल होने के बाद भी फेडरल बैंक ने अपना रुख नहीं बदला था। लेकिन इस बार भी बरकरार रखा तो दुनिया के कई बैंकों को अपनी चाल बदलनी ही पड़ेगी।
लेकिन, इसके उलट महंगाई के चार फीसद तक आने की अब कोई बात भी नहीं करता। 5.1 प्रतिशत के अनुमान के बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक ने इस दफा रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया। तो क्या भारत के लिए स्थितियां आसान हैं? ग्लोबल बदलाव से क्या हम लोग पूरी तरह बचे हुए हैं?
यदि ऐसा होता तो दीपक पारेख जैसे सम्मानित बैंकर यह न कहते कि दुनिया के आर्थिक हालात से कोई भी बिल्कुल अछूता नहीं रह सकता। हालांकि, देश के फंडामेंटल मजबूत हैं।
इसके अतिरिक्त मौसम की बेरुखी भी स्थितियां दुरूह बना रही हैं। फरवरी में तापमान में तेजी रही। मार्च में बेमौसमी बारिश ने भी किसानों पर आफत बरपाई है। गेहूं और सरसों की फसल पर काफी असर पड़ा है। ‘स्काईमैट’ ने इस साल मानसून में कम बारिश का अनुमान जताया है। यह एजेंसी मौसम का पूर्वानुमान लगाती है। यानी इस साल पैदावार कम होने की आशंका है।
तो सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे हालात में कृषि उत्पादों की सप्लाई पुख्ता रखने की है। साथ ही, कीमतों पर भी अंकुश लगाए रखना होगा। नौ राज्यों में चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर महंगाई पर लगाम लगाना सरकार की पहली प्राथमिकता होने वाली है। सरकार इसे समझ भी रही है। इसलिए गेहूं का अतिरिक्त स्टॉक बाजार में जारी किया गया। ताकि कीमतें काबू में रहें।
मौसम की मेहरबानी के हाल के तीन-चार साल खत्म हो गए हैं। ला नीना के स्थान पर इस बार अल नीनो आ रहा है। यह आमतौर पर सूखा लाता है। इसमें हवाएं पूर्व से पश्चिम के बदले पश्चिम से पूर्व की ओर चलने लगती हैं। नतीजतन, लातीनी, कैरेबियाई देशों में भरपूर बारिश होती है। ऑस्ट्रेलिया, भारत या दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में कम बारिश होती है। मौसम विज्ञानियों में इस बात पर बहस है कि अल नीनो कमजोर रहेगा या नहीं।

यदि कमजोर रहा तो कृषि पर कोई बहुत असर नहीं पड़ेगा। इसके उलट रहा तो चुनौती गंभीर भी हो सकती है। काबिलगौर है कि ला नीना की मेहरबानी के चलते दो पहिया और ट्रैक्टर की बिक्री के आंकड़े पिछले कुछ सालों में दुरुस्त रहे हैं। लेकिन, अल नीनो यह तस्वीर बेरंग भी कर सकता है।
तो असली चुनौती रिजर्व बैंक के सामने क्या है? महंगाई या विकास दर? कुछ समय से धीमी होती खपत परेशानियां बढ़ा रही हैं। इसके चलते बिक्री-उत्पादन-नौकरियों का चक्र टूटता है। बेरोजगारी बढ़ती है। इस दुष्चक्र में न फंसना ही सरकार का लक्ष्य होने वाला है। बहरहाल, महंगाई के मोर्चे पर सरकार कोई जोखिम नहीं उठा सकती है। कम से कम ऐसे सियासी हालात में तो कतई नहीं। फिर भी यह समझ से परे है कि रिजर्व बैंक ने महंगाई से निपटने से पल्ला क्यों झाड़ लिया? महंगाई ठिठकी है, रुकी नहीं।

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