जब मंदिर से निकलने लगे चुनावी संदेश और संसद में गूंजने लगे धार्मिक उपदेश
आज के समय में समाज एक अजीब मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहां धर्म और राजनीति की पारंपरिक सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। जिन लोगों का काम आध्यात्मिक मार्गदर्शन देना था, वे अब चुनावी सलाह देने में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं, जबकि जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि धार्मिक कर्मकांडों पर भाषण देते नजर आते…
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