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भारत की सड़कें बन रहीं हैं मौत का रास्ता, कौन जिम्मेदार?

धर्मपाल धनखड़ भारत में सड़क हादसे अब एक मूक आपदा का रूप ले चुके हैं। हर साल सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या किसी बड़े युद्ध से कम नहीं है। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, देश में प्रतिवर्ष लगभग 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें करीब 1.8 लाख लोगों की जान चली जाती है। ये आंकड़े न सिर्फ भयावह हैं, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

सड़क परिवहन मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि देश के सबसे खतरनाक राष्ट्रीय राजमार्ग उत्तर प्रदेश में हैं, जहां 2210 दुर्घटना-बहुल स्थान चिन्हित किए गए हैं। इसके बाद तमिलनाडु (1661), तेलंगाना (1535), पंजाब (1407) और पश्चिम बंगाल (1322) का स्थान है। देश के लगभग हर राज्य में ऐसे हजारों स्थान हैं, जहां दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। इसके उलट चंडीगढ़ और अंडमान-निकोबार देश की सबसे सुरक्षित सड़कों वाले क्षेत्र माने गए हैं।

केंद्र सरकार ने हादसों को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इंजीनियरिंग सुधार, वाहनों में तकनीकी सुरक्षा फीचर्स, सड़क सुरक्षा ऑडिट और चेतावनी संकेतकों की व्यवस्था की जा रही है। सड़क निर्माण बजट का 2.21 से 15 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षा उपायों पर खर्च करने का प्रावधान भी किया गया है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि चिन्हित दुर्घटना-स्थलों के सुधार में वर्षों लग जाते हैं।

स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब राज्य मार्गों और शहरी सड़कों की ओर नजर जाती है। गड्ढों से भरी सड़कें आम लोगों की जान ले रही हैं। दिल्ली के जनकपुरी और नोएडा में हुए हालिया हादसे प्रशासनिक लापरवाही के सबसे बड़े उदाहरण हैं, जहां समय पर बचाव होता तो जान बच सकती थी। नोएडा में तो घायल युवक के जीवित होने और लोकेशन बताने के बावजूद बचाव दल निष्क्रिय रहा।

ऐसे हादसे सिर्फ दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता हैं। जरूरत है कि जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो और सड़क सुरक्षा को कागजों से निकालकर ज़मीन पर उतारा जाए। वरना जानलेवा सड़कें यूं ही अपनों को निगलती रहेंगी।

 

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