नगालैंड में ILP और स्थानीय गारंटर की शर्त: बाहरी राज्यों के लोगों के गले की फांस, कुछ लोगों के लिये नया ‘बिजनेस’

सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार 

कोहिमा। नगालैंड में बाहरी राज्यों से आने वाले लोगों के लिए इनर लाइन परमिट (आईएलपी) की अनिवार्यता अब एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। खासकर डिमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड जैसे जिलों में, जहां हाल ही में ILP को सख्ती से लागू किया गया है, स्थानीय गारंटर की शर्त ने न केवल लोगों की मुश्किलें बढ़ाई है, बल्कि इसे एक नए ‘बिजनेस’ का रूप भी दे दिया है। आलम यह है कि स्थानीय गारंटर बनना अब कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बन गया है। इस अनियंत्रित प्रथा पर जिला प्रशासन को तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।

 

नगालैंड में गैर-स्थानीय लोगों के प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट, 1873 के तहत आईएलपी लागू है। इस साल सितंबर 2024 में नगालैंड सरकार ने डिमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड में आईएलपी लागू करने का फैसला किया, जो पहले डिमापुर में लागू नहीं था। इस नए नियम के तहत, व्यापारियों, मजदूरों, शिक्षकों और पुजारियों जैसे गैर-पर्यटक आवेदकों को आईएलपी प्राप्त करने के लिए एक स्थानीय गारंटर की जरूरत होती है, जो उनके आचरण की जिम्मेदारी लेता है।

हालांकि, यह शर्त अब एक समस्या बन गई है। कई लोग, विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूर या छोटे व्यापारी, जो रोजगार की तलाश में इन जिलों में आते हैं, स्थानीय गारंटर ढूंढने में खुद को असमर्थ पाते हैं। नतीजतन, कुछ स्थानीय लोग इस जरूरत को ‘अवसर’ में बदल रहे हैं और गारंटर बनने के लिए पैसे वसूल रहे हैं। नगालैंड के व्यावसायिक केंद्र डिमापुर में यह प्रथा तेजी से बढ़ रही है।

 

सूत्रों के अनुसार डिमापुर, चुमौकेदिमा और निउलैंड में कुछ लोग एक गारंटर के रूप में कई गैर-स्थानीय लोगों को ‘स्पॉन्सर’ कर रहे हैं, जिसके लिए वे मोटी रकम वसूल रहे हैं। नियम के अनुसार, एक गारंटर अधिकतम 10 लोगों को स्पॉन्सर कर सकता है, लेकिन कई मामलों में इस नियम की अनदेखी हो रही है। कुछ गारंटर कथित तौर पर 500 रुपये से लेकर 3,000 रुपये तक प्रति व्यक्ति वसूल रहे हैं, जिससे यह एक लाभकारी ‘बिजनेस’ बन गया है।

 

एक स्थानीय निवासी रमेश (बदला हुआ नाम) ने बताया, “मैं एक मजदूर हूं और डिमापुर में काम करता हूं। मुझे आईएलपी के लिए गारंटर चाहिए था, लेकिन मुझे कोई नहीं मिला। फिर एक व्यक्ति ने 1,000 रुपये में गारंटर बनने की पेशकश की। मेरे जैसे कई मजदूरों के पास इतने पैसे नहीं हैं, लेकिन काम के लिए मजबूरी में देना पड़ता है।”

 

जॉइंट कमेटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ इल्लीगल इमिग्रेंट्स जैसे स्थानीय संगठनों ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है। तिया लॉन्गचार नामक एक नागरिक ने कहा, “आईएलपी का मकसद गैर-कानूनी प्रवास को रोकना और स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा करना है, लेकिन गारंटर सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा है। एक गारंटर को एक या दो लोगों तक सीमित करना चाहिए, ताकि उनकी जिम्मेदारी सुनिश्चित हो। सरकार को इस प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की जरूरत है।”

 

कई लोगों का कहना है कि गारंटर बनने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। उदाहरण के लिए गारंटर को एक स्वदेशी प्रमाणपत्र (Indigenous Certificate) जमा करना होता है, कई कारोबारियों के पास नहीं होता। एक स्थानीय कारोबारी के अनुसार, “मैं अपने कर्मचारियों के लिए गारंटर बनना चाहता हूं, लेकिन मेरे पास स्वदेशी प्रमाणपत्र नहीं है, जो सरकारी नौकरी के लिए जरूरी है। यह नियम अव्यवहारिक है।”

 

इसके अलावा, ऑनलाइन आवेदन प्रणाली, जो 31 दिसंबर 2024 से अनिवार्य हो गई है, ने भी कई लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खासकर उन मजदूरों और छोटे व्यापारियों के लिए, जिनके पास डिजिटल संसाधनों तक पहुंच सीमित है।

 

नगालैंड सरकार और जिला प्रशासन को इस मुद्दे पर तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत है, ताकि आईएलपी का मूल उद्देश्य—स्थानीय संस्कृति और जनसांख्यिकी की रक्षा—बनाए रखा जा सके, बिना गैर-स्थानीय लोगों के लिए अनावश्यक बाधाएं पैदा कि

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