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‘तानसेन समारोह’ की पारंपरिक ढंग से हुई शुरुआत

ग्वालियर। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण महोत्सव ‘तानसेन समारोह’ ( ‘Tansen ceremony) की सुबह यहां पारंपरिक ढंग से शुरुआत हो गयी। यहां हजीरा स्थित तानसेन समाधि स्थल पर शहनाई वादन, हरिकथा, मिलाद, चादरपोशी और कव्वाली गायन हुआ। सुर सम्राट तानसेन की स्मृति में आयोजित होने वाले तानसेन समारोह का इस साल 99वां वर्ष है।

तानसेन समारोह का औपचारिक शुभारंभ आज सायंकाल हजीरा स्थित तानसेन समाधि परिसर में ऐतिहासिक मान सिंह तोमर महल की थीम पर बने भव्य एवं आकर्षक मंच पर होगा। इसी मंच पर बैठकर देश और दुनियां के ब्रम्हनाद के शीर्षस्थ साधक सुर सम्राट तानसेन को स्वरांजलि अर्पित करेंगे। सुबह की बेला में तानसेन समाधि स्थल पर परंपरागत ढंग से उस्ताद मजीद खां एवं साथियों ने रागमय शहनाई वादन किया।

इसके बाद ढोलीबुआ महाराज नाथपंथी संत  सच्चिदानंद नाथ जी ने संगीतमय आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए ईश्वर और मनुष्य के रिश्तो को उजागर किया। उनके प्रवचन का सार था कि परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं। अल्लाह और ईश्वर, राम और रहीम, कृष्ण और करीम, खुदा और देव सब एक हैं। हर मनुष्य में ईश्वर विद्यमान है। हम सब ईश्वर की सन्तान है तथा ईश्वर के अंश भी हैं। सभी मतों का एक ही है संदेश है कि सभी नेकी के मार्ग पर चलें।

उन्होंने कहा सुर ही धर्म है जो निर्विकार भाव से गाता है वही भक्त है। ढोली बुआ महाराज ने राग ‘बैरागी’ में तुलसीदास जी द्वारा रचित भजन प्रस्तुत किया। भजन के बोल थे ‘भजन बिन तीनों पन बिगड़े’। उन्होंने प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजाराम पतित पावन सीताराम’ का गायन भी किया। इसके अलावा उन्होंने विभिन्न रागों में पिरोकर अन्य भजन भी गए।

ढोलीबुआ महाराज की हरिकथा के बाद मुस्लिम समुदाय से मौलाना इकबाल लश्कर कादिरी ने इस्लामी कायदे के अनुसार मिलाद शरीफ की तकरीर सुनायी। उन्होंने कहा सबसे बड़ी भक्ति मोहब्बत है। उनके द्वारा प्रस्तुत कलाम के बोल थे ‘तू ही जलवानुमा है मैं नहीं हूँ’। अंत में हजरत मौहम्मद गौस व तानसेन की मजार पर राज्य सरकार की ओर से सैयद जियाउल हसन सज्जादा नसीन जी द्वारा परंपरागत ढंग से चादरपोशी की गई।

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