इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी!

वीरेंद्र सेंगर

ठीक एक सप्ताह के भीतर इजरायल-हमास (Israel-Hamas) के खूनी संघर्ष से पूरी दुनिया के सामने तीसरे विश्व युद्ध का खतरा बढ़ा है। दुनिया दो खेमों में बटती नजर आ रही है। 13 अक्टूबर को दोपहर के बाद इजरायल ने गाजा के तमाम रिहायशी इलाकों में हवाई हमले दोबारा किये। तमाम समझाइश के बाद भी गाजा में घुसकर जमीनी हमले शुरू कर दिए। बुलडोजरों से तमाम इमारतें ध्वस्त कर दी। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ (  United Nations) ने दो दिन पहले ही इजरायल को चेतावनी ( warning) दी थी कि वह थल युद्ध के लिए गाजा में घुसा, तो इसके परिणाम उसके लिए भी विनाशकारी होंगे। लेकिन अहंकारी इजरायली सरकार ने गाजा के आम नागरिकों को भारी संकट में डाल दिया। अमेरिका के अति उत्साह ने युद्ध को और भड़का दिया है। रूस ने भी गुस्सैल तेवर दिखाये हैं। एक दर्जन से ज्यादा इस्लामी मुल्क फिलीस्तीनियों के पक्ष में एकजुट हुए हैं। इस संकट काल में संघ परिवार इस युद्ध को अपना नया चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है।
इसे राष्ट्रीय विडंबना ही कहा जा सकता है। इन दिनों देश के अंदर पांच राज्यों में चुनाव की गहमा-गहमी चल रही है। यूं तो आमतौर पर विधानसभाओं के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा आधारित रहते हैं। लेकिन इधर, चुनावी समीकरण बदल गए हैं।( PM Modi) पीएम मोदी का चेहरा ही इन राज्यों में खास मुक़ाबले पर है। भाजपा की रणनीति आमतौर पर पीएम मोदी के भरोसे हो गई है। पार्टी के बड़े छत्रपों के कद भी बौने बनाए गए हैं। इसके ताजा शिकार मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान हैं। वे लगभग दो दशक से सत्ता में हैं। शुरुआती रुझान अच्छे नहीं देखकर, टीम मोदी ने निर्णायक दौर में उन्हें किनारे लगा दिया।
इससे शिवराज समर्थक लगभग अलग-थलग हो गए हैं। चौहान ने जो संकेत देने शुरू किए हैं, वे भाजपा के लिए अच्छे नहीं माने जा रहे। छत्तीसगढ़ में तो बीजेपी कांग्रेस के मुकाबले बहुत पीछे रह गई है। राजस्थान में जहां भाजपा के लिए उम्मीद नजर आ रही थी, वहां भी टीम मोदी के व्यवहार से पूर्व सीएम वसुंधरा नाराज है। यदि वे कोप भवन में ही रही, तो राजस्थान भी भाजपा से गया। राजनीति की थोड़ी भी परख रखने वाला ये आसानी से कह सकता है।
मणिपुर में पिछले कई महीनों से दो समुदायों के बीच गृह युद्ध की स्थिति बनी हुई है। वहां भाजपा की सरकार है। वह एकदम निकम्मी साबित हुई है। लेकिन मोदी सरकार ने वहां के अपने नकारा सीएम को भी नहीं बदला। इतने नरसंहारों के बाद भी वहां का जायजा लेने खुद नहीं गये। एक ढंग का बयान तक नहीं दिया। वहां कुकी समुदाय की महिलाओं को जिस तरह नंगा घुमाया गया, वे तस्वीर देखकर पूरी दुनिया सन्न रह गई। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी भाजपा सरकार की जमकर निंदा की। लेकिन सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। वहां बर्बर लीला मई से लेकर अब तक जारी है। पड़ोस का राज्य है मिजोरम। वहां भी अगले महीने चुनाव होने हैं। मणिपुर के हालात देखकर उत्तर पूर्व राज्यों में भाजपा बदनाम हुई है। उसकी राजनीतिक ताकत घटी है। हालत ये है कि भाजपा के बड़े राष्ट्रीय नेता वहां प्रचार में जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा के रणनीतिकार वहां राजनीतिक तोड़फोड़ की जुगाड़ में हैं।
तेलंगाना में भी बीआरएस के के.चंद्रशेखर राव सत्ता में हैं। उनके खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान काफी है। लेकिन सी एम राव तमाम राजनीतिक झांसे चलाने में लगे हैं। वे कभी टीम मोदी के साथ होते हैं, तो कभी विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के साथ खड़े नजर आते हैं। फिलहाल, वे अकेले चुनाव में हैं। यहां कांग्रेस फिर से मुख्य मुकाबले में है। हाल के चुनावी सर्वेक्षणों में कांग्रेस सत्ता की तरफ बढ़ती दिख रही है। भाजपा के रणनीतिकारों की कोशिश है कि चाहे चंद्रशेखर राव ही फिर चुनाव जीत जाए, लेकिन कांग्रेस के हाथ यहां की सत्ता न लगे। क्योंकि कुछ महीने पहले ही कर्नाटक की सत्ता कांग्रेस ने भाजपा से छीनी थी। जबकि मोदी जी ने पूरी ताकत लगा दी थी।
इस तरह पांचों चुनावी राज्यों में भाजपा की स्थिति कमजोर नजर आ रही है, जबकि भाजपा ने जगह-जगह सांप्रदायिक कार्ड चलाने की कोशिश की है। वह राज्यों की अपनी उपलब्धियां बताने की बजाय कांग्रेस को कोसती है। मध्यप्रदेश में भाजपा 18 सालों से शासन में है। फिर भी राज्य के पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस को कोसती है। ऐसे में उसके तर्क-तीर भोथरे साबित हो रहे हैं। राजस्थान में ये परंपरा रही है कि वहां हर पांच साल में लोग सरकार बदल देते हैं। लेकिन इस बार यह परंपरा टूटती नजर आ रही है। क्योंकि भाजपा के अंदर गुटबाजी और तेज हो गई है। जबकि सीएम अशोक गहलौत ने भाजपा के कई दांव खुद खेल लिये हैं। उनके देवस्थान मंत्रालय ने भाजपा के हिंदू कार्ड को भोथरा किया है। पुजारियों का मानदेय तीन हजार से बढ़कर पांच हजार रुपए प्रति माह करने की पहल कर दी थी। प्रमुख देवस्थानों के नवीनीकरण के लिए 3000 करोड रुपए का बजट भी दे दिया।
छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेस के सीएम चेहरे पिछड़े वर्ग के हैं। कर्नाटक में भी सीएम वंचित वर्ग का है। शिवराज चौहान को पार्टी ने जिस तरह से हाशिये में डाला है। इससे एक बड़ा पिछड़ा वर्ग नाराज है। यानी जातीय समीकरण में भी भाजपा मात खाती नजर आ रही है। पिछले महीने ही बिहार ने जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए थे। इससे भाजपा में बेचैनी देखी जा रही है। सोशल मीडिया के ईमानदार न्यूज़ पोर्टल सरकार के निशाने पर हैं। ‘न्यूज क्लिक’ को चीनी फंडिंग के नाम पर शिकंजे में लिया गया है। दर्जनों प्रमुख पत्रकारों को निशाना बनाया गया है।आतंकवाद निरोधक धाराएं भी लगाई गई हैं। जिससे कि सालों ये लोग जेल में सड़ते रहे। मजेदार बात ये है कि सरकार के तमाम अनुमान गलत साबित हुए। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि इस ‘प्रहार’ से तमाम खांटी ईमानदार पत्रकार एकदम डर जाएंगे। लेकिन परिणाम उल्टा रहा। तमाम खांटी पत्रकार देश के हर कोने में और सक्रिय हो गए। तमाम स्थानीय प्रखर न्यूज़ पोर्टलों की बाढ़ आ गयी। वे बेखौफ पत्रकारिता कर रहे हैं।
पिछले दिनों लद्दाख-कारगिल स्थानीय परिषद के चुनाव परिणाम आए हैं। यहां भाजपा सिर्फ दो सीट जीत पायी। जबकि कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस का बोल-बाला रहा। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि इसी परिणाम को देखकर शायद केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने की हिम्मत नहीं कर पायी। जबकि उम्मीद की जा रही थी कि अन्य पांच राज्यों के साथ यहां भी चुनाव करवाने का ऐलान होगा।
चुनावी प्रचार चरम पर है। कांग्रेस ने जातीय जनगणना पूरे देश में करने का संकल्प जताया है। कर्नाटक में भी पिछड़ी जाति की गणना की रिपोर्ट अगले महीने जारी होगी। राहुल गांधी विशेष तौर पर पिछड़े वर्ग के नायक बन रहे हैं। राहुल के ये तेवर भाजपा को बेचैन किए हैं। भाजपा जाति जनगणना के खिलाफ रही है। संघ परिवार के तमाम घटक इसे हिंदुओं को बांटने की चाल कहते रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर एनडीए के घटकों में मतभेद हो चले हैं। ऐसे में भाजपा चुप्पी साध रही है। पिछले वर्षों में भाजपा ने पिछड़े वर्गों पर मजबूत पकड़ बना रखी थी। क्योंकि मोदी भी इसी वर्ग से आते हैं। लेकिन बिहार के लालू यादव और नीतीश कुमार ने भाजपा का चुनावी गुब्बारा पंचर कर दिया है।
भाजपा के रणनीतिकार निजी तौर पर कहते हैं यदि पांचों राज्यों में पार्टी को हार मिली, तो इसका गहरा असर 24 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। इसलिए किसी तरह मध्यप्रदेश और राजस्थान को जीतना जरूरी है। संघ के लोग संकेत दे रहे हैं कि इजरायल-हमास युद्ध का राजनीतिक संदेश उनके बहुत काम का हो सकता है। भाजपा का आईटी सेल सक्रिय हो गया है।उसमें कांग्रेस को हिंदुत्व का दुश्मन बताने के लिए तमाम अनर्गल प्रचार युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया है। इस तरह के पोस्टर भी भोपाल, रायपुर, जोधपुर में लगाए गए हैं कि अमेरिका फ्रांस, ब्रिटेन इजरायल के साथ है। जबकि कांग्रेस मुस्लिम वोटो के लिए आतंकवादियों के साथ है। सोशल मीडिया में भी 12 अक्टूबर के बाद ये प्रचार तेज हुआ है।
जबकि वास्तविकता ये है कि हमास के आतंकियों को खत्म करने के नाम पर इजरायल 13 अक्टूबर से गाजा में घुसकर तबाही मचा रहा है। इजरायल ने ऐलान किया है कि गाजा की 11 लाख की आबादी अपने घर छोड़ दे। दक्षिण की ओर चली जाए। यूएनओ ने कहा इजरायल का ये फरमान बहुत भयानक परिणाम वाला साबित होगा। लेकिन संघ परिवार के तमाम घटक हिंदुत्व के नाम पर इजरायल की बर्बरता का समर्थन कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि जिस तरह की ‘बहादुरी’ इजरायल दिखा रहा है। ऐसा ही रुख भारत सरकार को अपनाना होगा। वरना इजरायल की तरह हिंदू हमेशा खतरे में रहेगा। है न मूर्खतापूर्ण विमर्श!

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