नई दिल्ली: प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की बढ़ती घटनाओं पर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि अब देशभर में पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराई जाएगी, ताकि दोषियों को जल्द और कड़ी सजा मिल सके। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि देश के युवाओं का भविष्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि पेपर लीक मामलों के त्वरित निपटारे और दोषियों को शीघ्र दंड दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। उनका कहना है कि समय पर न्याय मिलने से ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगेगी और परीक्षा प्रणाली में युवाओं का भरोसा मजबूत होगा।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा नई नहीं है। इसकी सिफारिश सबसे पहले 11वें वित्त आयोग ने की थी और वर्ष 2000 में देश में पहली बार फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत हुई थी। बाद में 14वें वित्त आयोग ने वर्ष 2015 से 2020 के दौरान देशभर में 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की सिफारिश की थी। इन अदालतों का उद्देश्य महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों और लंबे समय से लंबित गंभीर मामलों का तेजी से निपटारा करना था।
वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) योजना शुरू की। इस योजना के तहत केंद्र सरकार राज्यों को अदालतों की स्थापना के लिए 60 प्रतिशत वित्तीय सहायता देती है, जबकि शेष 40 प्रतिशत राशि राज्यों को वहन करनी होती है।
केंद्र सरकार द्वारा संसद में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, 31 जनवरी 2026 तक देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 862 फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्यरत हैं। इनमें सबसे अधिक 373 अदालतें उत्तर प्रदेश में हैं, जबकि महाराष्ट्र 105 अदालतों के साथ दूसरे स्थान पर है। सरकार का मानना है कि अब इसी व्यवस्था का उपयोग पेपर लीक मामलों में भी तेजी से न्याय सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा।