Paper Leak वार्ता : धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़ी CJP, सरकार का मानना- पद छोड़ना समाधान नहीं
Neet लीक पर सरकार-CJP में आर-पार : विट्ठल हाउस में 2 घंटे चली बैठक में दो मांगों पर नरमी, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की जिद पर अड़ा छात्र संगठन; सरकार 27 जुलाई को संसद में लाएगी 10 साल की सजा वाला नया बिल...
-ममता सिंह, नई दिल्ली।
नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में जारी आक्रोश और आंदोलनों के बीच नई दिल्ली के विट्ठल हाउस में एक बेहद महत्वपूर्ण सियासी व प्रशासनिक हलचल देखने को मिली। आंदोलन की अगुआई कर रही Cockroach Janata Party (सीजेपी) और केंद्र सरकार के उच्चस्तरीय प्रतिनिधियों के बीच करीब दो घंटे तक मैराथन बैठक चली।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और पीएमओ राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में सीजेपी प्रतिनिधि सौरभ दास और आशुतोष रांका ने तीन स्पष्ट शर्तें रखीं, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, आत्महत्या करने वाले 20 से अधिक पीड़ित छात्रों के परिवारों को मुआवजा, और प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमों की वापसी।

सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने और कानूनी कार्रवाई वापस लेने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सकारात्मक रुख दिखाया है, लेकिन शिक्षा मंत्री DharmendraPradhan के इस्तीफे की मुख्य मांग पर पेंच फंसा हुआ है। सरकार का तर्क है कि व्यक्ति विशेष के पद छोड़ने से व्यवस्था की जड़ जमा चुकी खामियां दूर नहीं होंगी। इसके बजाय सरकार Online परीक्षा मॉडल, तकनीकी सुधार और जीरो–टॉलरेंस नीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है।
दूसरी ओर, सीजेपी ने आर–पार का रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि जब तक धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होता, आंदोलन थमेगा नहीं। संगठन ने सरकार को कल दोपहर तक का अल्टीमेटम देते हुए एक नए राष्ट्रीय आह्वान की चेतावनी दी है।
व्यवस्थागत सुधारों को गति देते हुए PM Modi की अध्यक्षता में कैबिनेट ने ‘पेपर लीक विधेयक संशोधन‘ को मंजूरी दे दी है, जिसे 27 जुलाई को संसद के पटल पर रखा जाएगा। इस नए कानून के तहत पेपर लीक सिंडिकेट के दोषियों को अधिकतम 10 साल की कठोर कैद और ₹10 करोड़ तक के भारी–भरकम जुर्माने का प्रावधान है।
साथ ही मामलों के तीन महीने के भीतर निस्तारण के लिए Special Fast Track कोर्ट बनाए जाएंगे। 22 लाख छात्रों की दोबारा पारदर्शी परीक्षा कराने और 19 जुलाई को आए नतीजों के बाद, सरकार का यह कदम शिक्षा व्यवस्था में खोए भरोसे को बहाल करने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।