18 साल पुराने अहमदाबाद ब्लास्ट केस में बड़ा फैसला, हाईकोर्ट ने क्यों बरकरार रखी सजा?

अहमदाबाद। वर्ष 2008 में गुजरात की आर्थिक राजधानी अहमदाबाद को दहला देने वाले सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2026 को विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए सभी 49 आरोपियों की सजा को बरकरार रखा। इनमें 38 दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा और 11 को दी गई आजीवन कारावास की सजा यथावत रखी गई है।

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में करीब एक घंटे के भीतर 20 स्थानों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। भीड़भाड़ वाले बाजारों, सार्वजनिक परिवहन, रिहायशी इलाकों और अस्पतालों को निशाना बनाया गया था। इस आतंकी हमले में 57 लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इसके अलावा कई स्थानों से जिंदा बम भी बरामद किए गए थे, जिन्हें सुरक्षा एजेंसियों ने समय रहते निष्क्रिय कर दिया था।

धमाकों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन ने मीडिया संस्थानों को ई-मेल भेजकर ली थी। बाद में इस संगठन का नाम देश में हुई कई अन्य आतंकी घटनाओं में भी सामने आया। वर्ष 2010 में पुणे के जर्मन बेकरी विस्फोट के बाद केंद्र सरकार ने इंडियन मुजाहिदीन को प्रतिबंधित आतंकी संगठन घोषित कर दिया था।

इस बहुचर्चित मामले में कुल 78 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 1,163 गवाहों के बयान अदालत में पेश किए, जिससे यह देश के सबसे बड़े आपराधिक मुकदमों में शामिल हो गया। एक आरोपी अयाज सैयद जांच एजेंसियों का सहयोगी (अप्रूवर) बन गया था।

विशेष अदालत के न्यायाधीश ए.आर. पटेल ने 2022 में सुनाए गए फैसले में 28 आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था, जबकि 49 को दोषी ठहराते हुए कड़ी सजा सुनाई थी। अदालत ने धमाकों में जान गंवाने वाले प्रत्येक मृतक के परिजनों को एक-एक लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया था। हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने इस बहुचर्चित आतंकी मामले में विशेष अदालत के निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी है।

 

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