‘खंडूड़ी है जरूरी’… कैसे एक चेहरे ने बदल दी थी उत्तराखंड की राजनीति?

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में जब भी ईमानदारी, अनुशासन और सुशासन की चर्चा होगी, Bhuvan Chandra Khanduri का नाम सबसे सम्मान के साथ लिया जाएगा। सेना से राजनीति में आए जनरल खंडूड़ी ने सार्वजनिक जीवन में वही अनुशासन और राष्ट्रहित की भावना कायम रखी, जिसने उन्हें आम नेताओं से अलग पहचान दिलाई।

साल 2011 में उत्तराखंड भाजपा मुश्किल दौर से गुजर रही थी। सरकार की छवि पर सवाल उठ रहे थे और पार्टी की राजनीतिक जमीन कमजोर पड़ती दिख रही थी। ऐसे समय में भाजपा नेतृत्व ने संकटमोचक के तौर पर भुवन चंद्र खंडूड़ी पर भरोसा जताया। तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की जगह जब उन्हें राज्य की कमान सौंपी गई, तो जनता के बीच एक नई उम्मीद जगी।

मुख्यमंत्री बनते ही खंडूड़ी ने अपनी सख्त और बेदाग कार्यशैली से नौकरशाही को स्पष्ट संदेश दिया। “काम नहीं तो वेतन नहीं” जैसे फैसलों ने प्रशासनिक व्यवस्था में नई ऊर्जा भर दी। उनकी साफ छवि और कड़े फैसलों ने आम लोगों का भरोसा फिर से भाजपा की ओर मोड़ दिया।

इसी दौर में पूरा उत्तराखंड एक नारे से गूंज उठा—‘खंडूड़ी है जरूरी’। यह केवल चुनावी नारा नहीं था, बल्कि जनता की उस भावना का प्रतीक था जो एक ईमानदार और सख्त प्रशासक के प्रति दिखाई दे रही थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लगभग हारी हुई बाजी को पलट दिया और मजबूत वापसी की।

हालांकि राजनीति का सबसे बड़ा विडंबनापूर्ण क्षण तब सामने आया, जब पूरे राज्य में पार्टी को मजबूती दिलाने वाले खंडूड़ी खुद कोटद्वार सीट से मामूली अंतर से चुनाव हार गए। यह हार उत्तराखंड की राजनीति के सबसे चौंकाने वाले परिणामों में गिनी जाती है।

लेकिन चुनावी हार भी जनता के दिल में उनके सम्मान को कम नहीं कर सकी। उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया। जनरल खंडूड़ी आज भी उत्तराखंड में सुशासन, पारदर्शिता और राजनीतिक शुचिता के प्रतीक माने जाते हैं।

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