आज के दौर में बाजार जाकर फल और सब्जियां खरीदना किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। हर चमकती सब्जी और रंग-बिरंगे फल को देखकर मन में पहला सवाल यही उठता है कि यह प्राकृतिक है या केमिकल का कमाल। यही सवाल आम आदमी की चिंता और परेशानी को लेकर व्यंग्यकार कृष्ण गोपाल विद्यार्थी ने अपने तीखे और हास्यपूर्ण अंदाज में उठाया है।
लेख में बताया गया है कि आज सब्जी मंडियां किसी आर्ट गैलरी जैसी दिखाई देने लगी हैं। टमाटर इतने लाल और भिंडी-परवल इतने हरे दिखते हैं कि उन पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। सब्जियों को धोने पर पानी का रंग बदल जाना मिलावट और रसायनों की सच्चाई बयां करता है। वहीं फलों में इंजेक्शन और केमिकल के इस्तेमाल पर भी व्यंग्य किया गया है। तरबूज का अस्वाभाविक लाल रंग और कार्बाइड से पकाए गए आम अब लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
व्यंग्य में नकली दवाओं के कारोबार को भी निशाने पर लिया गया है। लेखक ने कटाक्ष करते हुए कहा कि अगर मिलावटी खाना खाकर कोई बीमार पड़ जाए तो मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली नकली दवाएं बीमारी से ज्यादा डर पैदा करती हैं। असली दवा जैसी दिखने वाली नकली गोलियां लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही हैं।
लेख में दूध, घी और मसालों में मिलावट का जिक्र करते हुए समाज की उस सच्चाई को उजागर किया गया है, जहां शुद्ध चीजें मिलना मुश्किल होता जा रहा है। व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा गया है कि अब इंसान का शरीर विटामिन से नहीं बल्कि “केमिकल रेजिस्टेंस” से मजबूत हो रहा है।
अंत में लेखक ने बेहद चुटीले अंदाज में भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा कि खाने में थोड़ी कम मिलावट मिले और उसे पचाने के लिए असली हाजमा भी मिले। यह व्यंग्य न केवल हंसाता है बल्कि समाज में बढ़ती मिलावट और लोगों की सेहत से हो रहे खिलवाड़ पर गंभीर सोचने के लिए भी मजबूर करता है।