नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़े असर ने पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को चिंता में डाल दिया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा, क्योंकि देश अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है और करीब 60 फीसदी एलएनजी सप्लाई होर्मुज मार्ग से होकर आती है। कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भारत के प्रमुख गैस आपूर्तिकर्ता रहे हैं, लेकिन हालिया संकट के चलते इन देशों से आपूर्ति में भारी गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि, चुनौतीपूर्ण हालात के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्रभावित नहीं होने दिया। सरकार और ऊर्जा कंपनियों ने तेजी से वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख किया और संभावित गैस संकट को टालने में सफलता हासिल की।
रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज मार्ग प्रभावित होने के बाद मार्च में भारत के एलएनजी आयात में गिरावट आई। इस दौरान कतर और यूएई से नई गैस खेप लगभग बंद हो गई थी। सामान्य तौर पर कतर से हर महीने करीब 0.95 मिलियन टन और यूएई से 0.27 मिलियन टन एलएनजी आयात होती थी, लेकिन मार्च-अप्रैल में यह घटकर क्रमशः 0.06 और 0.13 मिलियन टन रह गई।
इस कमी को पूरा करने के लिए भारत ने ओमान, अमेरिका, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से आयात बढ़ाया। इनमें सबसे अहम भूमिका ओमान ने निभाई। ओमान से आने वाली गैस होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर नहीं है और सीधे अरब सागर के रास्ते भारत पहुंचती है। यही कारण रहा कि ओमान से एलएनजी आयात, जो पहले औसतन 0.18 मिलियन टन प्रति माह था, बढ़कर मार्च-अप्रैल में 1.2 मिलियन टन तक पहुंच गया।
अमेरिका से भी एलएनजी सप्लाई बढ़ने से भारत को लंबी दूरी के बावजूद स्थिर आपूर्ति मिलती रही। वहीं, नाइजीरिया और अंगोला ने भी अतिरिक्त गैस उपलब्ध कराकर स्थिति को संभालने में मदद की। मार्च में एलएनजी आयात 1.67 मिलियन टन तक गिर गया था, लेकिन अप्रैल में यह बढ़कर 1.95 मिलियन टन हो गया। इससे साफ है कि भारत ने संकट के बीच अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सफलतापूर्वक संतुलित किया।