नज़रिया | धर्मपाल धनखड़ दुनिया एक बार फिर युद्ध और कूटनीतिक तनाव के चौराहे पर खड़ी है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की पहल से वैश्विक स्तर पर शांति की उम्मीद जरूर जगी, लेकिन हालात अब भी बेहद अनिश्चित बने हुए हैं। ईरान ने अमेरिका द्वारा पेश किए गए कई शर्तों वाले प्रस्ताव को खारिज करते हुए अपनी शर्तों पर ही युद्ध विराम की बात कही है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास गहराई तक पैठ चुका है।
ईरानी नेतृत्व का मानना है कि पिछली वार्ताओं के दौरान अचानक हुए हमले ने अमेरिका की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यही वजह है कि तेहरान अब किसी भी समझौते को लेकर बेहद सतर्क है। दूसरी ओर अमेरिका की रणनीति भी विरोधाभासी दिखाई देती है—एक तरफ वह बातचीत की बात करता है, तो दूसरी तरफ क्षेत्र में सैन्य तैनाती बढ़ा रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका वास्तव में शांति चाहता है या यह केवल सामरिक दबाव बनाने की रणनीति है।
इस पूरे घटनाक्रम में इज़राइल की स्थिति भी दिलचस्प है। इज़राइल को आशंका है कि अमेरिका बातचीत के बहाने युद्ध से पीछे हट सकता है, जिससे उसकी सुरक्षा और रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। हालिया संघर्ष में ईरान ने इज़राइल की बहुचर्चित रक्षा प्रणाली **आयरन डोम** को भेदकर उसके अभेद्य होने के मिथक को भी चुनौती दी है।
युद्ध के संभावित विस्तार ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को भी प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका है, जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है।
इन हालातों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि विश्व शांति बनाए रखने के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आखिर क्या कर रही हैं? दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य ही था कि भविष्य में ऐसे संघर्षों को रोका जा सके। शुरुआती दशकों में यूएन ने कई संकटों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ उसकी प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सबसे बड़ी कमजोरी उसके पांच स्थायी सदस्यों—रूस, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस—को मिला **वीटो अधिकार** है। यह अधिकार कई बार किसी भी ठोस कार्रवाई को रोक देता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसका समर्थन क्यों न कर रहा हो। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी यही स्थिति देखने को मिली, जब यूएन केवल बयान जारी करने तक सीमित रह गया।
इसी तरह, अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमलों के मुद्दे पर भी संयुक्त राष्ट्र निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर पाया। जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी देश को दूसरे पर हमला करने से रोकने की बात करते हैं, लेकिन जब शक्तिशाली देश ही इन नियमों को चुनौती देते हैं, तो संस्थाएं असहाय नजर आती हैं।
भारत ने हमेशा कूटनीति और संवाद के माध्यम से समस्याओं के समाधान पर जोर दिया है और संयुक्त राष्ट्र मंच पर युद्ध विराम की अपील भी की है। हालांकि, वैश्विक राजनीति के इस जटिल खेल में ऐसी अपीलें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं।
आज की दुनिया में यह बहस तेज हो गई है कि क्या संयुक्त राष्ट्र अपने मूल उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम है या उसे नए सिरे से संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था, महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और वीटो पावर की राजनीति ने इस संस्था की प्रभावशीलता को सीमित कर दिया है।
यदि संयुक्त राष्ट्र भविष्य में भी केवल अपील और निंदा तक सीमित रहा, तो वैश्विक शांति की अवधारणा और अधिक कमजोर होती जाएगी। ऐसे में समय की मांग है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संस्था को अधिक शक्तिशाली, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि विश्व शांति का सपना केवल कागज़ों तक सीमित न रह जाए।