धर्मपाल धनखड़ दुनिया का तीसरा ध्रुव कहे जाने वाले Hindu Kush Himalaya क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का संकेत बनता जा रहा है। International Centre for Integrated Mountain Development (आईसीआईएमओडी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 के बाद से हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है। पिछले 30 वर्षों में लगभग 12 प्रतिशत ग्लेशियर समाप्त हो चुके हैं, जो आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी है। 🌍
हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र को एशिया का ‘वाटर टावर’ कहा जाता है क्योंकि यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। Ganges , Brahmaputra और Indus जैसी प्रमुख नदियों का स्रोत यही हिमालयी ग्लेशियर हैं। भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत एशिया की लगभग दो अरब आबादी सीधे तौर पर इन जल स्रोतों पर निर्भर है। यदि ग्लेशियरों का क्षरण इसी गति से जारी रहा, तो इस सदी के अंत तक 70 से 80 प्रतिशत ग्लेशियर लुप्त हो सकते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में अस्थायी झीलों का निर्माण तेजी से हो रहा है। इन झीलों के टूटने से अचानक बाढ़, भूस्खलन और बड़े पैमाने पर तबाही की आशंका बढ़ जाती है। मानसून के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में आपदाओं की बढ़ती घटनाएं इसी बदलते जलवायु चक्र की ओर इशारा करती हैं। इसके विपरीत, ग्लेशियरों के समाप्त होने से गर्मियों में नदियों का जलस्तर घटेगा, जिससे सूखे और जल संकट की समस्या गहराएगी।
जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रयास किए गए हैं। 1992 में Earth Summit में जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सहमति बनी, जिसके बाद 1997 का Kyoto Protocol और 2015 का Paris Agreement जैसे महत्वपूर्ण समझौते अस्तित्व में आए। इनका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित कर पृथ्वी के तापमान वृद्धि को नियंत्रित करना था।
हालांकि, इन समझौतों के बावजूद विकसित देशों द्वारा ठोस कदमों की कमी और बढ़ते औद्योगिक उत्सर्जन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। हाल के वर्षों में विभिन्न युद्धों—जैसे Russia-Ukraine War —ने भी भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डाला है। जंगलों की कटाई और बार-बार लगने वाली आग ने इस संकट को और गहरा किया है।
स्पष्ट है कि ग्लेशियरों का पिघलना केवल हिमालयी क्षेत्रों की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। यदि समय रहते वैश्विक स्तर पर कारगर और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में जल संकट, खाद्य असुरक्षा और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि वैश्विक समुदाय जलवायु परिवर्तन को केवल राजनीतिक मुद्दा न मानकर मानवीय संकट के रूप में देखे। युद्धों और संसाधनों की होड़ को समाप्त कर पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। पृथ्वी को बचाने की यह लड़ाई सीमाओं से परे है और इसमें हर देश, हर समाज और हर व्यक्ति की जिम्मेदारी तय होती है।