‘दिल्ली दरबार की शाबाशी से साफ, 2027 में भी धामी ही होंगे भाजपा का चेहरा’

 ‘कांग्रेस खुद एक ‘चेहरा’ है; हम व्यक्ति नहीं, विचारधारा और 10 साल के काम पर लड़ेंगे’
 ‘भाजपा के 15 साल बनाम कांग्रेस के 10 साल; विकास की लकीर पर होगा आगामी चुनाव’
 ‘भाजपा के लिए ‘सनातनी’ की परिभाषा क्या? हम तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ वाले हैं! ‘

-अमर नाथ सिंह, देहरादून।

उत्तराखंड की सियासत के कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के व्यक्तित्व में वह नैसर्गिक आकर्षण है जो राजनीति की शुष्कता में भी जीवंतता भर देता है। आज जब उनके आवास पर पहुंचा, तो उनके चेहरे पर वही चिरपरिचित मुस्कान और आंखों में भविष्य की राजनीतिक बिसात को समझने वाली एक विशेष चमक थी। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जहां भाजपा अपने ‘धुरंधर’ चेहरों और ‘दिल्ली दरबार’ की शाबाशी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में है, वहीं हरीश रावत का आत्मविश्वास एक अलग ही कहानी बयां कर रहा था। औपचारिक अभिवादन के बाद बातचीत का सिलसिला हाल ही में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उत्तराखंड दौरे और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लेकर दिए गए उनके उस बयान से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने धामी को ‘धाकड़ नहीं, बल्कि धुरंधर’ बताया था।

इस पर रावत जी ने बड़े ही बेबाक और चुटीले अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि भाजपा के शीर्ष नेता उन्हें ‘धाकड़’ कहें, ‘धुरंधर’ कहें या फिर ‘काकड़’, इससे प्रदेश की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। रावत जी का तर्क था कि राजनीति में उपाधियां ऊपर से थोपी जा सकती हैं, लेकिन जनस्वीकार्यता तो केवल जमीनी स्तर पर हुए कार्यों से ही अर्जित होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली बात यह है कि उत्तराखंड की आम जनता धामी सरकार के बारे में क्या राय रखती है और आने वाले चुनावों में वह किस तरह का जनादेश सुनाती है। रावत जी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि ‘धुरंधर’ होने की कसौटी सरकारी विज्ञापनों में नहीं, बल्कि उन युवाओं की आंखों में है जो आज रोजगार के लिए भटक रहे हैं और उन हाथों में है जो बढ़ती महंगाई से त्रस्त हैं।
दिल्ली दरबार और भाजपा की आंतरिक राजनीति पर चर्चा करते हुए जब उनसे पूछा गया कि जिस तरह से केंद्रीय नेतृत्व अलग-अलग मंचों से मुख्यमंत्री धामी के कार्यकाल और उपलब्धियों को ऐतिहासिक बताते हुए शाबाशी दे रहा है, उसका क्या अर्थ निकाला जाए? इस पर रावत जी ने एक मंझे हुए राजनेता की तरह जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए कहा कि जिस तरह का समर्थन भाजपा नेतृत्व धामी को दे रहा है, उससे यह साफ है कि अब भाजपा के भीतर कोई चाहे कितनी भी जोर-आजमाइश कर ले, आगामी चुनावों में भाजपा का चेहरा धामी ही रहेंगे। उन्होंने माना कि भाजपा ने अपने नेतृत्व को लेकर संशय खत्म कर दिया है, लेकिन वे इसे कांग्रेस के लिए चुनौती के बजाय एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। इसी कड़ी में जब उनसे कांग्रेस के ‘चेहरे’ को लेकर सवाल दागा कि आखिर जनता कांग्रेस में किसे अपना मुख्य चेहरा देखे, तो रावत जी ने एक अनुभवी सेनापति की भांति उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी अपने आप में एक चेहरा है। हमारी पार्टी किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि अपनी विचारधारा और सेवा के इतिहास के साथ चुनाव मैदान में उतरती है। रावत जी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का सामूहिक नेतृत्व ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और जनता व्यक्ति विशेष के बजाय कांग्रेस की नीतियों पर भरोसा करेगी।
रणनीति और भविष्य की रूपरेखा पर विस्तार से बात करते हुए रावत जी ने आगामी चुनावी बिसात का खाका खींचा। उन्होंने बताया कि कांग्रेस की रणनीति बहुत स्पष्ट है। हम भाजपा के इन 15 वर्षों के कुशासन और कांग्रेस के उस स्वर्णिम 10 साल के शासनकाल के बीच एक तुलनात्मक लकीर खींचेंगे। रावत जी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि जनता हमारे कार्यों का आकलन करेगी और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी।
जब उनसे पूछा गया कि धामी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को काफी समय बीत गया, लेकिन कांग्रेस की नई कार्यकारिणी का गठन अब तक क्यों नहीं हो पाया है, तो उन्होंने बड़े ही धैर्य के साथ संगठन की आंतरिक स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि कांग्रेस एक लोकतांत्रिक दल है जहां हर निर्णय से पहले गहन विचार-मंथन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। रावत जी के अनुसार, संगठन की मजबूती के लिए चर्चा का दौर जारी है और प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल जल्द ही एक ऐसी ऊर्जावान कार्यकारिणी की घोषणा करेंगे जो भाजपा की विफलताओं को जन-जन तक पहुंचाएगी।
बातचीत का रुख जब चारधाम और बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष द्वारा दिए गए हालिया विवादित बयानों की ओर मुड़ा, तो हरीश रावत के भीतर का सनातनी और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षक मुखर हो उठा। उन्होंने भाजपा की सनातनी व्याख्या पर प्रहार करते हुए कहा कि हमें वास्तव में यह समझ नहीं आता कि वर्तमान सरकार के लिए सनातन की परिभाषा क्या है। रावत जी ने बड़े ही गंभीर स्वर में स्पष्ट किया कि हमारी सोच और संस्कार हमेशा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के दर्शन से ओत-प्रोत रहे हैं। उत्तराखंड के पवित्र धाम पूरी मानवता के लिए आस्था के केंद्र हैं और जो भी व्यक्ति इन धामों में सच्ची श्रद्धा रखता है, उसका वहां ससम्मान स्वागत होता रहा है। उन्होंने आस्था के नाम पर किए जाने वाले राजनीतिक वर्गीकरण और द्वेषपूर्ण बयानों को देवभूमि की शालीन परंपराओं के विरुद्ध बताया। रावत जी ने कहा कि सनातनी होने का अर्थ समावेशी होना है, न कि दूसरों को अपमानित करना।
साक्षात्कार के अंतिम पड़ाव पर जब चर्चा का दायरा उत्तराखंड से बढ़कर राष्ट्रीय राजनीति और पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों तक पहुंचा, तो रावत जी का आत्मविश्वास देखते ही बनता था। उन्होंने दो टूक शब्दों में दावा किया कि हवा का रुख पूरी तरह बदल चुका है और इन पांचों राज्यों में कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। उनके अनुसार, जनता अब जुमलों की चकाचौंध से बाहर निकल कर बुनियादी हकीकत को देख रही है, जहां कांग्रेस का सेवा भाव और समावेशी राजनीति ही एकमात्र विकल्प नजर आता है। उनकी आवाज में एक ऐसा ठहराव था जो केवल दशकों के जमीनी संघर्ष से आता है।
पूरे साक्षात्कार के दौरान रावत जी की शब्दावली में जहां एक ओर राजनीतिक परिपक्वता दिखी, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड की अस्मिता को लेकर एक गहरा सरोकार भी झलका। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि आगामी चुनाव केवल चेहरों की लड़ाई नहीं, बल्कि कार्यशैली, नीयत और देवभूमि के भविष्य के संरक्षण का मुकाबला होगा। उनकी गरिमापूर्ण शैली और तर्कों की धार यह बता रही थी कि वे आने वाले समय में भाजपा के लिए सबसे बड़ी वैचारिक और राजनीतिक चुनौती बने रहेंगे। इस साक्षात्कार ने यह भी साफ कर दिया कि उत्तराखंड की राजनीति में चेहरे भले ही नए हों, लेकिन बिसात अभी भी हरीश रावत जैसे पुराने और मझे हुए खिलाड़ियों से मंत्रणा करके ही बिछाई जाएगी।

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