देश में इच्छा मृत्यु (यूथेनेशिया) को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हाल ही में Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए पहली बार इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है। अदालत ने लंबे समय से कोमा में पड़े गाजियाबाद निवासी हरीश राणा के मामले में जीवन रक्षक मशीनें हटाने की अनुमति प्रदान की।
न्यायमूर्ति J. B. Pardiwala और K. V. Viswanathan की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया कि हरीश राणा को All India Institute of Medical Sciences में भर्ती कर डॉक्टरों की देखरेख में जीवन रक्षक उपकरण हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाए। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि इस प्रक्रिया में मरीज की गरिमा और सम्मान बना रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छा मृत्यु से संबंधित स्पष्ट कानून बनाने पर विचार करने का सुझाव भी दिया है। अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों से भी कहा है कि वे अपने राज्यों के न्यायिक मजिस्ट्रेटों को निर्देश दें कि जब प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड किसी मरीज की जीवन रक्षक मशीनें हटाने पर सहमत हों, तो अस्पतालों से इसकी जानकारी प्राप्त करें।
इस फैसले के साथ भारत में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) को कानूनी मान्यता मिल गई है। हालांकि सक्रिय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia) अभी भी भारत में गैरकानूनी है। दुनिया के कई देशों—जैसे नीदरलैंड, बेल्जियम और कनाडा—में सक्रिय इच्छा मृत्यु भी कानूनी है, जहां सख्त प्रक्रिया के बाद डॉक्टरों का पैनल असाध्य रोग से पीड़ित मरीज को इंजेक्शन देकर जीवन से मुक्ति प्रदान करता है।
भारत में यह अधिकार संविधान के Article 21 of the Constitution of India से जुड़ा हुआ माना जाता है, जिसमें सम्मानपूर्वक जीवन जीने के साथ-साथ गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी निहित बताया जाता है। हरीश राणा के मामले में न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि यह निर्णय निश्चित रूप से दुखद है, लेकिन किसी व्यक्ति को लंबे समय तक असहनीय पीड़ा में रखना भी उचित नहीं है।
इस फैसले के बाद याचिकाकर्ता और हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने कहा कि यह केवल उनके बेटे का मामला नहीं है, बल्कि देश में ऐसे कई मरीज हैं जो लंबे समय से कोमा में हैं और उनके परिवार लगातार कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे मामलों में यह निर्णय राहत दे सकता है।
हालांकि इस विषय पर मतभेद भी हैं। कुछ वरिष्ठ चिकित्सकों का मानना है कि कई बार लंबे समय तक कोमा में रहने के बाद भी मरीज स्वस्थ हो जाते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां ब्रेन डेड घोषित की गई एक महिला की हालत अचानक सुधरने लगी। इस तरह के उदाहरण इच्छा मृत्यु के मुद्दे को और जटिल बना देते हैं।
फिर भी यह भी सच है कि लंबे समय तक चलने वाले महंगे इलाज और असाध्य बीमारी का बोझ न केवल मरीज बल्कि पूरे परिवार के लिए बेहद कष्टदायक होता है। ऐसे में कई बार परिजन आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं। इसके अलावा देश के अस्पतालों में जीवन रक्षक मशीनों की सीमित उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इच्छा मृत्यु के संबंध में स्पष्ट और संतुलित कानून बनाना जरूरी है, जिससे मरीज की गरिमा, परिवार की स्थिति और चिकित्सा नैतिकता—तीनों का संतुलन कायम रखा जा सके।