बिजली-पानी की बढ़ती दरों पर रावत के मौन व्रत से विरोधियों में बढ़ी हलचल
भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री के निर्णय को केवल चुनावी स्टंट और नाटक बताया
अस्मिता बिष्ट, देहरादून।
खंड की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक बार फिर अपने अनूठे अंदाज से सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। देहरादून स्थित अपने आवास पर बिजली और पानी की बढ़ती दरों के खिलाफ ‘मौन उपवास’ पर बैठकर उन्होंने न केवल सरकार को घेरा, बल्कि 15 दिनों के ‘राजनीतिक संन्यास’ की घोषणा कर सबको चौंका दिया। रावत का यह कदम महज एक सांकेतिक विरोध नहीं है, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए बिछाई जा रही एक गहरी बिसात के रूप में देखा जा रहा है। वे जानते हैं कि पहाड़ की राजनीति में इमोशनल कार्ड और जमीनी मुद्दों का तालमेल ही सत्ता की राह खोलता है।
हरीश रावत का यह मौन व्रत सीधे तौर पर आम जनता की जेब से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में बिजली की दरों में हुई बढ़ोतरी और पानी के बिलों में सुधार की मांग मध्यम वर्ग और ग्रामीण आबादी के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। रावत ने बिजली-पानी को अपना हथियार बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे अभी भी जनहित के सबसे बड़े पैरोकार हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि 15 दिनों का यह आत्मचिंतन दरअसल एक बड़ी चुनावी रणनीति की तैयारी है। वे इस समय का उपयोग अपनी पिछली गलतियों के विश्लेषण और 2027 के लिए ‘उत्तराखंडियत’ के नए रोडमैप को तैयार करने में करना चाहते हैं।
सियासी पंडितों की मानें तो रावत का यह ‘रिट्रीट’ कांग्रेस के भीतर अपनी स्थिति को और मजबूत करने का भी एक तरीका है। 15 दिनों तक मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहकर वे अपनी अहमियत को और बढ़ाना चाहते हैं। जब वे इस अंतराल के बाद वापस आएंगे, तो उनके पास निश्चित रूप से सरकार को घेरने के लिए अधिक धारदार एजेंडा होगा। यह कदम उस समय उठाया गया है जब भाजपा अपने भीतर ‘बाहरी बनाम मूल’ और ‘कैबिनेट विस्तार’ के अंतर्विरोधों से जूझ रही है। रावत इस स्थिति का फायदा उठाकर खुद को एक गंभीर और विचारशील विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं।
दूसरी ओर, भाजपा ने हरीश रावत के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना है कि यह रावत का पुराना ‘चुनावी स्टंट’ है। भाजपा प्रवक्ताओं का तर्क है कि जब वे सत्ता में थे, तब उन्होंने इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया और अब हार के डर से ध्यान भटकाने के लिए उपवास और संन्यास का नाटक कर रहे हैं। भाजपा का मानना है कि धामी सरकार के विकास कार्यों और हालिया कैबिनेट सुधारों से कांग्रेस डरी हुई है, इसलिए उसके वरिष्ठ नेता इस तरह के भावनात्मक हथकंडे अपना रहे हैं।
कुल मिलाकर, हरीश रावत का यह मौन उपवास और अल्पकालिक संन्यास उत्तराखंड की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह स्पष्ट करता है कि 2027 की जंग अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह धारणाओं और नैरेटिव की लड़ाई होगी। रावत ने अपनी ‘मौन’ रणनीति से सरकार को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया है और जनता के बीच यह चर्चा छेड़ दी है कि क्या वाकई विपक्ष अब अधिक गंभीर मोड में आ गया है। आने वाले 15 दिन न केवल रावत के लिए बल्कि उत्तराखंड की पूरी सियासत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं।