मिशन 2026: असमिया बनाम ‘मिया’ सियासत

हिमंत ने मिया राजनीति पर कड़ा रुख अपनाकर तेज कर दिया ध्रुवीकरण
भाजपा नेतृत्व पहचान को ढाल बनाकर स्वदेशी समुदायों को एकजुट कर रहा!
ऊपरी असम में सीएए और एनआरसी का डर दूर करना भाजपा के लिए चुनौती

ममता सिंह, नई दिल्ली /गुवाहाटी।

असम की सियासत में इन दिनों ‘मिया’ राजनीति और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा केंद्र बिंदु बन गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय यानी ‘मिया’ आबादी को लेकर अपने बयानों से ध्रुवीकरण की एक नई लकीर खींच दी है। उनका रुख बेहद कड़ा है और वह स्पष्ट रूप से स्वदेशी असमिया पहचान की रक्षा को अपनी राजनीति का आधार बना रहे हैं। यह रणनीति केवल एक समुदाय के विरोध तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की एक सोची-समझी योजना नजर आती है। भाजपा विकास के दावों के साथ ‘सांस्कृतिक अस्मिता’ को एक मजबूत ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह दांव विशेष रूप से ऊपरी असम और स्वदेशी समुदायों के बीच भाजपा की पकड़ को फिर से मजबूत करने के लिए खेला गया है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) को लेकर स्थानीय समुदायों में जो नाराजगी उपजी थी, उसे कम करने के लिए ‘असमिया पहचान’ का कार्ड सबसे कारगर साबित हो रहा है। भाजपा के नेता सार्वजनिक मंचों से कह रहे हैं कि असम की जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है। वे तर्क दे रहे हैं कि यदि अभी कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में स्वदेशी लोग अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक हो जाएंगे। भाजपा इस मुद्दे के जरिए हिंदू वोटों के बिखराव को रोकने और उन्हें एक बड़े पहचान के मुद्दे पर एकजुट करने की कोशिश में है। ताजा आंकड़ों और चुनावी रुझानों को देखें तो इस ध्रुवीकरण का सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। पार्टी ने खुद को ‘असमिया संस्कृति के रक्षक’ के तौर पर पेश किया है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस के सांसद गौरव गोगोई इस पूरी स्थिति को एक अलग नजरिए से देख रहे हैं। 2026 का आगामी विधानसभा चुनाव अब केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। एक ओर हिमंत बिस्वा सरमा का ‘प्रशासनिक दक्षता’ और ‘कठोर हिंदुत्व’ वाला मॉडल है। दूसरी ओर गौरव गोगोई की ‘सभ्य और समावेशी’ राजनीति है। गोगोई कोशिश कर रहे हैं कि वे भाजपा के इस ध्रुवीकरण के जाल में न फंसें। वे आर्थिक मुद्दों, बेरोजगारी और चाय बागान श्रमिकों की समस्याओं को उठाकर भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की फिराक में हैं। यदि गौरव गोगोई इस रणनीति में सफल होते हैं और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक को हिला पाते हैं, तो वे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के सबसे कद्दावर चेहरों में शामिल हो जाएंगे।
भाजपा के भीतर से भी इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि वे किसी समुदाय के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन ‘घुसपैठियों’ की राजनीति को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उनका मानना है कि मिया समुदाय का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव असम की मूल संस्कृति के लिए खतरा है। भाजपा के रणनीतिकारों को भरोसा है कि ध्रुवीकरण की यह नई परिभाषा उन्हें आगामी चुनाव में स्पष्ट बढ़त दिलाएगी। कुल मिलाकर, असम की राजनीति अब दो ध्रुवों में बंट गई है। एक ध्रुव ‘सांस्कृतिक सुरक्षा’ की बात कर रहा है, तो दूसरा ‘समावेशी विकास’ की। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि असम की जनता पहचान की इस लड़ाई को चुनती है या समावेशी राजनीति के दावों पर भरोसा जताती है। फिलहाल, माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है और मिया राजनीति इस खेल का सबसे बड़ा मोहरा बन चुकी है।

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