राजयोगिनी बी.के. गीता दीदी ने 11 मार्च की प्रातः अमृत बेला में माउंट आबू स्थित ब्रह्माकुमारीज के मुख्यालय शांतिवन में अपनी देह का त्याग कर दिया। वे 70 वर्ष की थीं। बताया गया कि 9 मार्च को उन्हें मस्तिष्कघात और हृदयघात के कारण ब्रह्माकुमारीज के ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया था, जहां उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन से ब्रह्माकुमारीज परिवार और आध्यात्मिक जगत में शोक की लहर है।
राजयोगिनी गीता दीदी ब्रह्माकुमारीज के बिज़नेस एंड इंडस्ट्रीज़ विंग की मुख्यालय संयोजिका थीं। इस दायित्व पर रहते हुए उन्होंने देश और विदेश के अनेक उद्यमियों व व्यापारियों को आध्यात्म से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने उन्हें राजयोग ध्यान की शिक्षा देकर जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
गीता दीदी का जन्म वर्ष 1955 में गुजरात के आनंद जिले के एक शिक्षित और संस्कारी परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अध्ययन और चिंतनशील साहित्य पढ़ने का विशेष शौक था। वे महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और विनोबा भावे जैसे महान विचारकों से प्रभावित थीं।
सन् 1969 में मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्हें माउंट आबू में ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद 1972 में अव्यक्त बापदादा से प्रेरणा मिलने पर उन्होंने अपना पूरा जीवन ईश्वरीय सेवा के लिए समर्पित कर दिया। अपने सेवा काल में उन्होंने सूरत, भरूच, अहमदाबाद, वडोदरा और भावनगर सहित गुजरात के कई सेवा केंद्रों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
उन्होंने वर्ष 1995 से 2010 तक माउंट आबू स्थित ज्ञान सरोवर में आंतरिक प्रशासिका के रूप में सेवाएं दीं। इसके बाद 2011 से शांतिवन में मुख्य राजयोग शिक्षिका के रूप में सक्रिय रहीं। वर्ष 1996 से वे बिज़नेस एंड इंडस्ट्रीज़ विंग की मुख्यालय संयोजिका के रूप में भी कार्य कर रही थीं।
एक प्रभावशाली वक्ता और कुशल प्रशिक्षिका के रूप में गीता दीदी ने भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, अफ्रीका, मॉरीशस और बांग्लादेश जैसे देशों में भी ईश्वरीय ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। उनका जीवन सरलता, त्याग, तपस्या और सेवा का अद्भुत उदाहरण रहा।
उनकी प्रेरणादायी स्मृतियां सदैव आध्यात्मिक परिवार और समाज को मार्गदर्शन देती रहेंगी।
(लेखक ब्रह्माकुमारीज से जुड़े आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)