देहरादून में ‘नवोदित प्रवाह’ के लोक संस्कृति विशेषांक का लोकार्पण, साहित्यकारों ने बताया भारतीय लोक जीवन का अनमोल दस्तावेज
देहरादून। Doon Library and Research Centre के सभागार में साहित्यिक पत्रिका Navodit Pravah के लोक संस्कृति विशेषांक का भव्य लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का आयोजन केंद्र के तत्वावधान में हुआ, जिसमें देश और प्रदेश के कई वरिष्ठ साहित्यकारों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। इस विशेषांक का संपादन साहित्यकार Rajneesh Trivedi ने किया है। लोकार्पण के बाद लोक संस्कृति पर एक विस्तृत विमर्श भी आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात कवि और साहित्यकार, Leeladhar Jagudi थे, जिन्हें Sahitya Akademi Award और Padma Shri से सम्मानित किया जा चुका है। कार्यक्रम की अध्यक्षता Radha Raturi ने की।
अपने संबोधन में लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि ‘नवोदित प्रवाह’ का यह लोक संस्कृति विशेषांक अत्यंत वैदुष्यपूर्ण और संग्रहणीय है। उन्होंने कहा कि इस अंक को देखते ही प्राकृत कविताओं की परंपरा का स्मरण हो आता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में ऐसे कवि दुर्लभ हो गए हैं, जो भाषा के शब्दों के माध्यम से अपने मनोभावों की नई और सशक्त अभिव्यक्ति कर सकें। जगूड़ी ने कहा कि इस प्रकार की विद्वतापूर्ण पत्रिका का प्रकाशन अपने आप में एक विलक्षण घटना है। उन्होंने विशेष रूप से डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी की कविता “कोई घर आने वाला है” का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे पढ़कर उन्हें अतीत की कई स्मृतियाँ ताजा हो गईं।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और पूर्व पुलिस महानिदेशक तथा साहित्यकार Anil Raturi ने विशेषांक का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 के इस वार्षिक अंक में लोक संस्कृति से संबंधित लगभग 107 साहित्यिक लेखों का संग्रह किया गया है। इसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों का व्यापक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
विशेषांक में अवध, भोजपुरी, कन्नौज, मैथिली, विदर्भ, मालवा, गढ़वाल, कुमाऊं, जौनसार और रवांई जैसे अनेक आंचलिक क्षेत्रों की लोक संस्कृति को भी स्थान दिया गया है, जिससे पाठकों को भारतीय लोक जीवन की विविधता और समृद्धि का व्यापक परिचय मिलता है।
पूर्व कुलपति और विदुषी लेखिका Sudha Pandey ने कहा कि यह विशेषांक लोक संस्कृति के जीवंत संदेश का संवादवाहक है। इसमें उत्तर से दक्षिण तक की लोक यात्रा के साहित्यिक और सांस्कृतिक आयामों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि लोक जीवन की परंपराएँ, गीत, नृत्य और संस्कृति मनुष्य की चेतना को आनंद से भर देते हैं।
पद्मश्री Madhuri Barthwal ने लोक संस्कृति में लोक संगीत के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्चा लोकगीत वही है, जो आत्मा से निकलता है। उन्होंने गढ़वाली लोकगीत प्रस्तुत कर कार्यक्रम में लोक रंग भी भर दिया।
संस्कृत के विद्वान और कवि Ram Vinay Singh ने कहा कि वेद शास्त्रीय ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि लोक आम जनमानस की भावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। उन्होंने लोक जीवन की परंपराओं, रीति-रिवाजों, खान-पान, वेशभूषा, कला और उत्सवों को लोक संस्कृति की आधारशिला बताया।
अध्यक्षीय संबोधन में राधा रतूड़ी ने कहा कि ‘नवोदित प्रवाह’ का यह अंक भारतीय समाज की सांस्कृतिक विविधता को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि इस विशेषांक में देश के विभिन्न प्रांतों की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को कुशलता से संजोया गया है।
कार्यक्रम की शुरुआत कुलबीर कौर द्वारा वाणी वंदना से हुई। संपादक रजनीश त्रिवेदी ‘आलोक’ ने स्वागत भाषण दिया, जबकि संचालन कवयित्री भारती मिश्रा ने किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने दिया। इस अवसर पर कई साहित्यकार, शिक्षाविद और बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।