आशीष सिंह
रांची। डिजिटल युग में सोशल मीडिया आज केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि वैश्विक डेटा-अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा औजार बन चुका है। मेट्रो शहरों से लेकर गांव-देहात तक हर आयु वर्ग का व्यक्ति सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय है, लेकिन इसके साथ ही निजता, डेटा सुरक्षा और डिजिटल गरिमा से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। यूज़र्स का व्यवहार ट्रैक करना, फोटो-वीडियो को आसानी से डाउनलोड कर लेना और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ज़रिये उनके दुरुपयोग की आशंका—यह सब विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के स्थापित बिज़नेस मॉडल का हिस्सा बन चुका है।
इसी वैश्विक डिजिटल व्यवस्था के बीच झारखंड की राजधानी रांची से एक नया भारतीय प्लेटफॉर्म ‘जक्टर (ZKTOR)’ उभरकर सामने आया है, जो इस डेटा-केंद्रित मॉडल को जड़ से चुनौती देता है। जक्टर खुद को सिर्फ एक सोशल मीडिया ऐप नहीं, बल्कि डेटा-उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक वैचारिक और तकनीकी आंदोलन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
Privacy by Design: नीति नहीं, सिस्टम का हिस्सा
जक्टर की सबसे बड़ी विशेषता है इसका “Privacy by Design” दृष्टिकोण। यहां यूज़र की निजता किसी सेटिंग या पॉलिसी पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ऐप के पूरे सिस्टम आर्किटेक्चर में ही समाहित है। प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया गया हर संदेश, फोटो और वीडियो पूर्णतः एन्क्रिप्टेड रूप में सुरक्षित रहता है, जिसे स्वयं प्लेटफॉर्म भी पढ़ या देख नहीं सकता। इस तकनीकी संरचना को Zero Knowledge Architecture कहा जाता है।
यह मौजूदा वैश्विक सोशल मीडिया मॉडल से बिल्कुल अलग है, जहां डेटा प्रोफाइलिंग और बिहेवियर ट्रैकिंग ही कमाई का आधार है। जक्टर का मॉडल Zero Behaviour Tracking पर आधारित है, जो यूज़र की डिजिटल गरिमा और डेटा संप्रभुता को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है।
No-URL टेक्नोलॉजी: महिलाओं की डिजिटल गरिमा की सुरक्षा
जक्टर की एक और अहम तकनीकी विशेषता है इसकी No-URL Content Structure। सामान्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हर फोटो या वीडियो का एक सार्वजनिक URL होता है, जिसे आसानी से डाउनलोड, शेयर या AI के ज़रिये मॉडिफाई किया जा सकता है। जक्टर में ऐसा संभव नहीं है।
इस तकनीक के कारण कंटेंट प्लेटफॉर्म के बाहर कॉपी, री-अपलोड या दुरुपयोग से काफी हद तक सुरक्षित रहता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फीचर खासतौर पर महिलाओं की डिजिटल गरिमा और ऑनलाइन सुरक्षा के लिहाज़ से एक बड़ा कदम है। साथ ही यह सवाल भी खड़ा करता है कि इतने वर्षों में वैश्विक प्लेटफॉर्म्स ने ऐसी संरचनात्मक सुरक्षा को प्राथमिकता क्यों नहीं दी।
एक ऐप, कई सुविधाएं: भारतीय सुपर-ऐप
जक्टर को एक ऑल-इन-वन भारतीय सुपर-ऐप के रूप में विकसित किया गया है। इसमें सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म, लॉन्ग वीडियो प्लेटफॉर्म और पूरी तरह एन्क्रिप्टेड मैसेंजर—सभी सुविधाएं एक ही ऐप में उपलब्ध हैं। यूज़र को अलग-अलग ऐप्स पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती।
इसके साथ ही जक्टर का डेटा हैंडलिंग मॉडल DPDP (भारत) और GDPR (यूरोप) जैसे डेटा सुरक्षा कानूनों की भावना को सीधे तकनीकी ढांचे में शामिल करता है, न कि सिर्फ कागज़ी नीतियों में।
डेटा संप्रभुता और स्थानीय सर्वर मॉडल
जक्टर का एक अहम पहलू है डेटा सॉवरेन्टी। प्लेटफॉर्म को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि अलग-अलग देशों के स्थानीय कानूनों और रेगुलेटरी अपेक्षाओं के अनुरूप डेटा हैंडलिंग और सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर संभव हो सके। यह उस वैश्विक बहस को मजबूती देता है, जिसमें कई देश अपने नागरिकों का डेटा अपने ही देश में रखने की वकालत कर रहे हैं।
बिना विदेशी फंडिंग, बिना कॉरपोरेट दबाव
जक्टर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले Softa के फाउंडर और जक्टर के शिल्पकार सुनील कुमार सिंह का झारखंड से गहरा नाता है। उनका जन्म अविभाजित बिहार (वर्तमान झारखंड क्षेत्र से सटे औरंगाबाद) के एक छोटे गांव में हुआ और उन्होंने दो दशकों से अधिक समय फिनलैंड में बिताया। वहां की उच्च तकनीक, डेटा प्राइवेसी और सामाजिक समानता की अवधारणाओं को उन्होंने जक्टर में शामिल किया है।
खास बात यह है कि जक्टर को किसी भी तरह के दबाव से मुक्त रखने के लिए न भारत सरकार और न ही फिनलैंड सरकार से कोई ग्रांट ली गई, और न ही किसी विदेशी वेंचर कैपिटल से फंडिंग स्वीकार की गई। इसका उद्देश्य साफ है—प्लेटफॉर्म को बाज़ार-प्रेरित प्रोफाइलिंग या कॉरपोरेट हितों से मुक्त रखना।
क्रिएटर्स और युवाओं के लिए अवसर
जक्टर सिर्फ डेटा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोज़गार और क्रिएटर इकोनॉमी पर भी फोकस करता है। इसके मोनेटाइजेशन मॉडल में कंटेंट क्रिएटर्स को सीधा 70 प्रतिशत मुनाफा दिया जाता है, जो मौजूदा प्लेटफॉर्म्स की तुलना में कहीं अधिक है।
इसके अलावा, जक्टर के हाइपर-लोकल ऑपरेशंस के माध्यम से टियर-2, टियर-3 और टियर-4 शहरों में हजारों युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
साउथ एशिया में बीटा टेस्टिंग शुरू
जक्टर अब पूरी तरह तैयार है और इसकी मास बीटा टेस्टिंग भारत, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में शुरू हो चुकी है। यह प्लेटफॉर्म Google Play Store और Apple App Store दोनों पर उपलब्ध है।
डिजिटल इंडिया के दौर में जक्टर का उभार इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल टेक्नोलॉजी का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निजता-केंद्रित और सामाजिक सरोकारों वाली टेक्नोलॉजी का निर्माता बनने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।