क्या भारत की अल्पसंख्यक आबादी को हाशिये पर धकेला जा रहा है?

एक ऐसी लंबी श्रृंखला के सवाल—जिनके जवाब देने की हिम्मत कोई नहीं करता

(आफरीन हुसैन)

जिस दिन यह साफ़ होने लगा कि भारत में अल्पसंख्यकों पर दबाव बढ़ रहा है, उसी दिन एक और बात भी स्पष्ट हो गई एक ऐसा पैटर्न बन रहा है जिसे बहुत से लोग मानने तक को तैयार नहीं।

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के आने के बाद से ही क्यों लगता है कि भेदभाव ने एक संगठित, व्यवस्थित रूप ले लिया है?
और क्यों, अनगिनत चेतावनियों के बावजूद, सत्ता में बैठे लोग ज़रा भी चिंतित दिखाई नहीं देते?

हमें बताया जाता है कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” सरकार का मंत्र है।
सच में?

तो फिर अल्पसंख्यक खासकर मुसलमान
धीरे. धीरे असुरक्षित, अनसुना और उपेक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं?

क्या यही “विकास” है? रिपोर्टें लगातार कह रही हैं कि मुसलमानों को किनारे धकेला जा रहा है।

क्या हर एक रिपोर्ट झूठी है?
या हर एक ज़मीनी हक़ीक़त बस असहज करने वाली है?

नागरिकता से लेकर धर्मांतरण और गाय से जुड़े कानूनों तक,
क्यों हर नया नियम किसी न किसी तरह केवल अल्पसंख्यकों पर ही असर डालता है?
यह भी संयोग है
या साज़िश?

RSS–BJP गठजोड़ पर communal माहौल को बढ़ावा देने का आरोप क्यों लगता है?

भीड़ की हिंसा को रोकने के बजाय उसे हवा क्यों मिलती है?

और डर को राजनीतिक औज़ार बनाने से किसे फायदा होता है?

दस साल… हाँ, पूरा एक दशक।
इन वर्षों में हमने कैसी “न्यू इंडिया” बनाई है जहाँ अल्पसंख्यक अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा महसूस करते हैं?

नागरिकता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता
ये सब कब से अधिकारों के बजाय “विशेषाधिकार” बन गए?

अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है।
स्कॉलरशिप बंद की जा रही हैं।

सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की संख्या लगभग ग़ायब।
प्रतिनिधित्व घट रहा है।
रोज़गार छिन रहा है।
व्यवसाय टूट रहे हैं।
व्यक्तिगत स्वतंत्रताएँ संकुचित हो रही हैं।

और फिर भी कहा जाता है, “सबको बराबरी मिलती है।”
वास्तव में?

अगर यही बराबरी है, तो भेदभाव कैसा होता होगा?

अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग
USCIRF बार-बार चेतावनी देता है।
भारत हर बार उसे खारिज कर देता है।
ठीक है, रिपोर्ट को खारिज कर दीजिए।

लेकिन क्या भारत उन 20 करोड़ मुसलमानों की रोज़मर्रा की हकीकत को भी खारिज कर सकता है?

अल्पसंख्यकों को हर बार याद दिलाया जाता है कि वे “अल्पसंख्यक” हैं, लेकिन विडंबना यह कि मुसलमान भारत की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं।

बताइए, 20 करोड़ लोगों को हाशिये पर धकेलकर देश कैसे आगे बढ़ सकता है?

जब एक बड़ा समुदाय संस्थाओं, शासन, न्याय और संविधान के वादों पर भरोसा खोने लगे

तो फायदा किसे होता है?
और नुकसान किसका होता है?
जवाब स्पष्ट है—पूरे राष्ट्र का।

यदि विकास सचमुच सबके लिए है, तो फिर अल्पसंख्यक हर मोड़ पर खुद को बाहर क्यों पाते हैं?

अगर भारत प्रगति कर रहा है, तो उसके नागरिकों का इतना बड़ा हिस्सा भय और असुरक्षा में क्यों जी रहा है?

क्या यह सचमुच प्रगति है या राष्ट्रवाद के नाम पर पक्षपात को “देशभक्ति” का मुखौटा पहना दिया गया है? और आखिर में एक चुभता हुआ सवाल क्या कोई देश सच में ऊपर उठ सकता है, जबकि वह अपने ही लोगों को नीचे धकेलने में व्यस्त हो?

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