सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार ।
हर साल की तरह इस साल भी नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा हुई, और हमेशा की तरह इस बार भी डोनाल्ड ट्रंप साहब की सुनहरी उम्मीदें धरी की धरी रह गईं। दुनिया में “सबसे बड़े डीलमेकर” कहलाने वाले ट्रंप इस बार भी **‘शांति’ वाले नोबेल** से चूक गए। लेकिन उनका अंदाज़ हमेशा की तरह अनोखा रहा — ट्वीट्स की बरसात और व्यंग्य भरे अंदाज़ में अपनी “शांति नीति” का प्रचार।
नोबेल कमेटी की ‘गुप्त मीटिंग’: जब ट्रंप का नाम आया तो माहौल बदल गया
सूत्रों के मुताबिक, ओस्लो में हुई नोबेल कमेटी की मीटिंग में जब ट्रंप का नाम आया तो माहौल एकदम बॉलीवुड फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा हो गया। एक सदस्य ने फाइल खोलते हुए कहा, “डोनाल्ड जे. ट्रंप — अब्राहम एकॉर्ड्स, नॉर्थ कोरिया के साथ ‘लव लेटर डिप्लोमेसी’, और अफगानिस्तान में ‘चाय पर चर्चा’। इन्हें शांति पुरस्कार क्यों न दें?”
तभी दूसरे सदस्य, जो शायद ट्रंप के “Fire and Fury” ट्वीट्स से अब भी मानसिक आघात में थे, बोले, “शांति? ये वही ट्रंप हैं जो एक दिन ‘वर्ल्ड पीस’ की बात करते हैं और अगले दिन ट्वीट करते हैं — *‘मेरे पास न्यूक्लियर बटन तुम्हारे बटन से बड़ा है!’* ये शांति है या रियलिटी शो?”
तीसरा सदस्य बोला, “ट्रंप की शांति तो दिल्ली के ट्रैफिक जाम में ‘ओम शांति ओम’ चिल्लाने जैसी है। सब सुनते हैं, कोई मानता नहीं! और उनके ट्वीट्स का फॉन्ट इतना बड़ा है कि हमारे मेडल पर जगह ही नहीं बचेगी!”
मार-ए-लागो में ‘ट्वीट तांडव’
इस बीच ट्रंप साहब अपने **मार-ए-लागो रिसॉर्ट** में टीवी देख रहे थे, तभी नोबेल पुरस्कार की खबर आई। बस फिर क्या था — फोन उठा, ट्विटर खुला और ट्वीट्स की बरसात शुरू!
पहला ट्वीट:
> “DISGRACEFUL! नोबेल कमेटी ने फिर मेरी TREMENDOUS पीस डील्स को नजरअंदाज किया। मैंने दुनिया को बचाया, और वो किसी पेड़ लगाने वाले को पुरस्कार दे रहे हैं! #MakeNobelGreatAgain”
दूसरा ट्वीट आया:
> “मेरे अब्राहम एकॉर्ड्स को कौन भूल सकता है? मिडिल ईस्ट में शांति मेरे कारण आई! लेकिन नोबेल कमेटी? SO BIASED! शायद उन्हें मेरे GOLDEN HAIR से जलन है!”
सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप ने अपने स्टाफ को बुलाकर कहा, “मुझे नोबेल चाहिए। दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार — मेरे लिए बना है!” स्टाफ ने हिम्मत जुटाकर सुझाव दिया, “सर, क्यों न आप अपना पुरस्कार शुरू करें — *Trump Peace Prize!* मेडल गोल्ड-प्लेटेड और साइज में स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी जितना बड़ा।” ट्रंप मुस्कुराए — “ब्रिलियंट! और पहला पुरस्कार किसे मिलेगा? बिल्कुल, मुझे!”
नोबेल कमेटी की दुविधा
नोबेल कमेटी के सदस्यों की असली मुश्किल थी — ट्रंप की “शांति” को मापने का पैमाना! एक सदस्य ने कहा, “इनकी डील्स तो ठीक हैं, लेकिन नोबेल पाने वाले में थोड़ी सादगी भी होनी चाहिए। ट्रंप मंच पर आएंगे तो कहेंगे — ‘ये पुरस्कार छोटा है। मैं मंगल ग्रह पर भी शांति ला सकता हूँ, बस वहाँ ट्विटर चाहिए!’”
दूसरा सदस्य बोला, “अगर इन्हें दे दिया तो अगले दिन ट्वीट आएगा — ‘Nobel won because I’m the best. बाकी विजेता? लूज़र्स!’”
आखिरकार, कमेटी ने फैसला किया — इस साल भी नहीं।
ट्रंप का ‘मास्टरप्लान’: नोबेल के बदले डील
पर ट्रंप साहब कहाँ हार मानने वाले! अब खबर है कि वो नोबेल कमेटी को “डील ऑफर” देने की सोच रहे हैं। प्लान है — नोबेल पुरस्कार के बदले अपने गोल्फ कोर्स में फ्री मेंबरशिप। और अगर बात न बनी, तो अपने समर्थकों को कहेंगे, “नो ट्रंप, नो पीस!” के नारे लगवाओ।
इंटरनेट पर ट्रंप बने मीम का केंद्र
दुनिया भर में सोशल मीडिया पर ट्रंप के नोबेल से वंचित रह जाने पर मीम्स और चुटकुले छा गए। एक यूज़र ने लिखा, “ट्रंप को नोबेल नहीं, ‘ट्वीट ऑफ द ईयर’ अवॉर्ड दो!” एक अन्य ने कहा, “अगर नोबेल कमेटी में ट्विटर होता, तो अब तक हर कैटेगरी में ट्रंप जीत चुके होते!”
अगले साल की तैयारी: #NobelForTrump
ट्रंप अब 2026 की तैयारी में जुट गए हैं। बताया जा रहा है कि वे एक नया कैंपेन चलाने वाले हैं — **#NobelForTrump**, जिसमें दुनिया भर के उनके फॉलोअर्स रोज़ एक ट्वीट करेंगे — “Give Nobel to Trump!”
और अगर फिर भी पुरस्कार न मिला, तो ट्रंप का कहना है —
> “तो मैं खुद अपना नोबेल बना लूंगा — *The Trump Peace Prize!* मेडल मेरे ट्वीट्स जितना बड़ा होगा और उसकी चमक मेरे गोल्डन हेयर जैसी!”
सटायर का सार
दुनिया चाहे हँसे या हैरान हो, ट्रंप की “शांति की परिभाषा” अब भी वही है — **ट्वीट से शुरू होती है और डील पर खत्म होती है।** नोबेल कमेटी के लिए वो शायद बहुत ज्यादा “नोइज़ी पीस” हैं, लेकिन उनके समर्थकों के लिए वे अब भी “विश्व शांति के सबसे ट्वीटेबल नेता” हैं।