नगालैंड विश्वविद्यालय की अभिनव पहल, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान के संकट से जूझती 18 नगा भाषाओं के लिये रचेंगे “व्याकरण”

सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
लुमामी (नगालैंड) ।’नगालैंड यूनिवर्सिटी’ ने देश की मुख्यधारा से अलग-थलग इस अंचल की 18 अनोखी भाषाओं के संरक्षण की दिशा में एक भगीरथ प्रकल्प हाथ में लिया है। कह सकते हैंं कि यह आधुनिक पाणिनि बनने जैसा है। राज्य का इकलौता केंद्रीय विश्वविद्यालय पूर्वोत्तर के सीमित क्षेत्रों में बोली जाने वाली इन भाषाओं को समृद्धि देने के लिये इनका व्याकरण विकसित करेगा। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश के. पटनायक इसे एक ऐसा सांस्कृतिक मिशन बताते हैं, जो नगा भाषाई विरासत को संरक्षित करने और NEP 2020 के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में एक अहम कदम है।

परियोजना का महत्व:
हालांकि नगा भाषाएँ दशकों से स्कूलों में पढ़ाई जाती रही हैं, लेकिन शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के लिए इनमें से किसी भी भाषा का समर्पित लिखित व्याकरण उपलब्ध नहीं था। यह पहल इस कमी को पूरा करती है, जिसमें भाषा के विभिन्न पहलुओं जैसे शब्द-भेद, काल, वाक्यांश और खंड संरचना, स्वर और शब्दावली का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। यह परियोजना न केवल NEP 2020 के बहुभाषी शिक्षा के दृष्टिकोण को मजबूत करती है, बल्कि भाषाई हाशियेकरण के जोखिम को भी कम करती है, जिससे प्रत्येक नगा भाषा को प्रमुख भाषाओं के समान महत्व मिले।

यह परियोजना निम्नलिखित लक्ष्यों पर केंद्रित है:
व्याकरण का दस्तावेजीकरण: 18 नगा भाषाओं के लिए व्याकरण—जैसे शब्द-भेद, काल, वाक्यांश और खंड संरचना, और स्वर—का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण।

-पाठ्यपुस्तक एकीकरण:
कक्षा 5 से 12 तक की पाठ्यपुस्तकों में व्याकरण को शामिल करना, जिसमें गद्य, कविता और अनुवाद भी होंगे।

-शिक्षक प्रशिक्षण:
नगालैंड विश्वविद्यालय द्वारा रिफ्रेशर कोर्स के माध्यम से शिक्षकों को व्याकरण शिक्षण के लिए प्रशिक्षित करना।

-सहयोग:
भाषा साहित्य बोर्ड, नगा भाषाओं के राज्य केंद्र (SCNL), SCERT, और NBSE के साथ मिलकर पाठ्यक्रम में व्याकरण को एकीकृत करना।

इस अभिनव परियोजना का नेतृत्व नगालैंड विश्वविद्यालय के तेन्यिदी विभाग की प्रमुख और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मिमी केविचुसा एजुंग कर रही हैं। तेन्यिदी, अंगामी समुदाय और तेन्यिमिया समूह की नौ अन्य जनजातियों की मानक भाषा है।

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर भाषा विलुप्ति की दर काफी चिंताजनक है। यूनेस्को के अनुसार हर दो सप्ताह में एक भाषा विलुप्त हो रही है। नगा भाषाएँ, जो मुख्य रूप से मौखिक परंपराओं पर निर्भर हैं, इस संकट के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। लिखित व्याकरण और मानकीकरण की कमी के कारण ये भाषाएं अंतर-पीढ़ीगत हस्तांतरण में बाधा का सामना करती हैं, जो भाषा विलुप्ति का प्रमुख कारण है। नगालैंड विश्वविद्यालय की यह पहल इस जोखिम को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

डॉ. मिमी केविचुसा ने कहा, “लिखित व्याकरण किसी भाषा की अमूर्त विशेषताओं का औपचारिक प्रतिनिधित्व है। यह नगा भाषाओं के मानकीकरण के दौर में स्थिरता और गौरव सुनिश्चित करता है। यह पहल केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहचान, संस्कृति और स्वदेशी ज्ञान के संरक्षण का भी प्रतीक है।”
न्यूमाई, लियांगमाई साहित्य बोर्ड के कैटुनचाप (जोशुआ) कहते हैं कि “नगा भाषाओं के लिए व्याकरण का दस्तावेजीकरण हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
लियांग्माई साहित्य बोर्ड के सदस्य कैटुनचाप (जोशुआ) न्यूमाई ने कहा, “नगा भाषाओं के लिए व्याकरण का दस्तावेजीकरण हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भाषा शिक्षण को मजबूत करेगा और मातृभाषा में गर्व को बढ़ाएगा।”
स्कूल शिक्षा और SCERT विभाग की आयुक्त और सचिव सुश्री केविलेनो अंगामी ने कहा, “नगालैंड विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याकरण कार्यशालाएँ नगा भाषाओं की संरचना को समझने में महत्वपूर्ण रही हैं। प्रारंभिक स्तर से व्याकरण पढ़ाने से छात्रों को स्पष्टता मिलेगी और उनकी भाषा शिक्षा मजबूत होगी।”

नगालैंड में: 18 मान्यता प्राप्त भाषाएँ हैं। इनमें से कई केवल मौखिक रूप में जीवित हैं। कह सकते हैंं कि ये धीरे धीरे कम प्रचलित होने की तरफ बढ़ रही हैं। इनके नाम आओ, चांग, चोकरी, खियामनियुंगान, कोन्याक, कूकी, कुज्हाले (खेझा), लियांग्माई, लोथा, न्थेन्यी (दक्षिणी रेंग्मा), नजोन्ख्वे (उत्तरी रेंग्मा), फोम, पोचुरी, संग्तम, सूमी, तेन्यिदी (अंगामी), यिमखियुंग और जेमे हैं।

वर्तमान में, केवल तेन्यिदी, आओ, लोथा और सूमी जैसी कुछ भाषाएँ ही कक्षा 8 से आगे पढ़ाई जाती हैं, जिसमें तेन्यिदी एमए और पीएचडी स्तर तक उपलब्ध है। यह व्याकरण लेखन पहल अन्य भाषाओं को उच्च शिक्षा स्तर तक विस्तार देने की नींव रखेगी। परियोजना के तहत विकसित व्याकरण को कक्षा 5 से 12 तक की पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जाएगा, जिसमें गद्य, कविता और अनुवाद के साथ-साथ व्याकरण भी होगा।
कुल मिलाकर नगालैंड विश्वविद्यालय की यह पहल न केवल शैक्षिक सुधार की दिशा में एक कदम है, बल्कि नगा समुदाय की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने का एक सशक्त प्रयास भी है।

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