हिंदी मर नहीं रही—हम उसे अपंग बना रहे हैं
शीशपाल गुसाईं , देहरादून।
हम सब कहते हैं—“हिंदी को बढ़ावा दीजिए।” पर भीतर-भीतर, हमारे घरों में, भोजन की मेज़ से लेकर मोबाइल की स्क्रीन तक, रोज़मर्रा के छोटे-छोटे फ़ैसलों में, अंग्रेज़ी को हम दर्जा देते हैं—स्टेटस का, “सभ्यता” का, “सफलता” का। चाय उबल रही है तो “केटल” की चर्चा हो जाती है, बरतन…
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