“चार मई, दीदी गई?”—नारे के पीछे की सियासी सच्चाई क्या है, पढ़ें पूरा व्यंग्य
नई दिल्ली। चुनावी मौसम में नारों की गूंज अक्सर राजनीति की दिशा तय करने की कोशिश करती है, लेकिन उनकी उम्र बेहद सीमित होती है। “चार मई, दीदी गई” जैसे नारे भी इसी राजनीति का हिस्सा हैं, जो नतीजों से पहले ही माहौल बनाने का प्रयास करते हैं।
व्यंग्यकार के अनुसार, यदि वास्तव में Mamata Banerjee सत्ता से…
Read More...
Read More...