दरकते रिश्ते, सिसकती मर्यादा

सियासत : ममता बनाम मोदी, धनखड़

राधा कृष्ण प्रसाद
कोलकाता।रणनीति तो थी बंगाल को मोदीमय, भगवामय बनाने की, लेकिन बंगाली अस्मिता, संस्कृति और परंपरा की रक्षा के नाम पर बंगाल ममतामय हो गया और राज्य के साथ केंद्र, राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच तनातनी और गहरा गयी। रणनीति जब तार-तार होती है, सपने जब चकनाचूर होते हैं, दावे जब धूलिसात होते हैं, साम-दाम-दंड-भेद की व्यूहरचना जब भहरा कर ढह जाती है तब अहं फूंफकारने लगता है, बदले की भावना और तीव्र हो उठती है। बंगाल की राजनीति का वर्तमान परिदृश्य इसी त्रासद दौर से गुजर रहा है।
  • बंगाल की राजनीति में बढ़ रही वर्चस्व की लड़ाई  
  •  अंतहीन टकराव के तार वर्तमान से ही नहीं, भविष्य से भी जुड़े  

वर्चस्व की यह लड़ाई लगातार बढ़ती जा रही है और विराम की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है क्योंकि कोई भी पक्ष एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं चूकता। हर चीज को राजनीतिक नफा-नुकसान की नजर से देखा जाता है। इस अंतहीन टकराव के तार भूत और वर्तमान से ही नहीं, भविष्य से भी जुड़े हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो भाजपा शायद इसे एक राज्य में हुई हार समझकर भूल जाती और ममता को नीचा दिखाने के हथकंडे से बाज आ जाती। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, भाजपा असम और पुडुचेरी में जीत गयी, केरल, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल में हार गयी। केरल और तमिलनाडु में तो वह खाता भी नहीं खोल पायी लेकिन उसका मलाल उसे नहीं है।

पश्चिम बंगाल में 75 सीटों (भाजपा 77 सीटों पर विजयी हुई थी लेकिन दो सीटों पर उसके प्रत्याशियों ने इस्तीफा दे दिया और संसद की अपनी सीट कायम रखी) पर जीत के बावजूद वह अपनी हार पचा नहीं पा रही है। तीन सीटों से बढ़ कर 75 सीटें जीतना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है लेकिन जब लक्ष्य 200 पार का हो और हर रैली, हर सभा में जीत के अहं भरे दावे किये गये हों तो हार की टीस पैदा होती ही है। आम चुनाव में भाजपा ने राज्य की 42 में से 18 सीटें जीती थी और विधानसभा सीट के हिसाब से करीब 120 सीटों पर आगे थी। लक्ष्य इसी आधार पर निर्धारित किया गया था और जिस प्रकार से आक्रामक चुनाव प्रचार किया गया था, जीत का एक आभामंडल तैयार किया गया था, वह अभूतपूर्व था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के चाणक्य अमित शाह, केंद्र और राज्यों के मुख्यमंत्रियों (राजनाथ सिंह, जे पी नड्डा, स्मृति ईरानी, मनोज तिवारी, कैलाश विजयवर्गीय, योगी आदित्यनाथ जैसे पार्टी के दिग्गज नेता इनमें शामिल थे) सहित भाजपा के करीब 350 नेताओं की फौज मैदान में थी। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व अभियान था जिसमें प्रधानमंत्री ने 20 रैलियों (16 प्रत्यक्ष और 4 वर्चुअल) को संबोधित किया, अमित शाह ने चार दर्जन से अधिक रैलियां कीं, रोड शो किये, अन्य नेताओं ने भी दर्जनों रैलियां, रोड शो किये। इससे स्पष्ट है कि भाजपा बंगाल को जीतने के लिए कितनी बेताब थी और उसकी तैयारियां कितनी विशाल थीं। और उनके सामने अडिग इरादों वाली ममता बनर्जी थीं, आद्यांत स्ट्रीट फाइटर दीदी। एक अकेली दीदी पूरी फौज पर भारी पड़ गयीं।

राजनीतिक विश्लेषक इसे एकनायकवाद पर लोकतंत्र की, घृणा की राजनीति पर सद्भाव की, कट्टरवाद विभाजनकारी, धु्रवीकरण के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की जीत के रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं, सुदृढ़ भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की जीत मान रहे हैं। भाजपा की यह पराजय हेकड़ी, विपक्ष पर तंज कसने की निंदनीय प्रवणता की पराजय है। मोदी अपनी हर चुनावी रैली में कहते, ‘2 मई, दीदी गयीं’। ममता दीदी ने अपनी हार स्वीकार कर ली है और इसी कारण हमारे खिलाफ गलतबयानी, अनर्गल प्रलाप कर रही हैं। दीदी ने दिखा दिया कि यदि लड़ने की दृढ़ मनोवृत्ति हो तो मोदी-शाह और उनकी पूरी टोली को धूल चटाया जा सकता है। ममता इस जीत के साथ ही भारतीय राजनीति में पथप्रदर्शक बन गयी हैं। आने वाले दिनों में उनकी राजनीतिक भूमिका एक नये आयाम ले सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी तथा वर्तमान भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह से ममता के टकराव का एक प्रमुख कारण केंद्र के हथकंडे भी हैं। ईडी, आयकर विभाग, सीबीआई आदि केंद्रीय एजेंसियों को मोर्चे पर लगाया गया। भय, मामले चलाने, छापे आदि से कतिपय राजनेताओं का दोहन किया गया, उन्हें तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने का प्रलोभन दिया गया, कुछ बहती गंगा में हाथ धोने चले आये, कुछ व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के चक्कर में सर्वस्व गंवा बैठे।

गहराती कड़वाहट:मोदी और ममता के बीच कड़वाहट 21 जनवरी के बाद गहराने लगी जब नेताजी की 125वीं जयंती पर विक्टोरिया मेमोरियल में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। मोदी ने इसे पराक्रम दिवस कहा तो ममता ने देशनायक दिवस। वहां दोनों नेता एक साथ नजर आये लेकिन किसी ने किसी से बात नहीं की। मुख्य कार्यक्रम में यह तल्खी साफ झलकी जब सभा में उपस्थित किसी ने जय श्रीराम का नारा लगा दिया और विरोध में ममता ने इसे अपना अपमान माना और नेताजी के बारे में बिना भाषण दिये बैठ गयीं। उस दिन मोदी ने अपने विचार रखे लेकिन इस घटना पर मौन रहे। फिर चुनाव आया और दोनों पक्षों ने प्रचार के दौरान सारी नैतिकता, शिष्टाचार को ताक पर रख दिया और एक दूसरे पर जिस तरह के घटिया शब्दों के प्रयोग किए वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अभूतपूर्व था। ममता ने एक ओर जहां चड्ढा, नड्डा, हुंबा, बुंबा, मिथ्यावादी, धंधाबाज, बहिरागत जैसे शब्दों से मोदी, शाह, नड्डा पर निशाना साधा तो दूसरी ओर मोदी ने दीदी ओ दीदी कहकर ममता का उपहास उड़ाया, ‘दो मई, दीदी गयीं’ कहकर उन्हें चिढ़ाया। शाह और अन्य नेताओं ने सिंडिकेट राज, भाइपो, भ्रष्टाचार आदि शब्दों से हमले किए। नंदीग्राम में ममता के पैर में मोच आ गयी और प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने तो सारी हदें पार कर दी, कहा, लोग उनका चेहरा नहीं देखना चाहते, इसलिए वे अपना टूटा पैर दिखा रही हैं, यदि आप पैर दिखाना चाहती हैं तो अच्छा हो, बरमूडा पहनें। चुनाव के तल्ख लम्हों के बीत जाने के बाद भी मोदी के साथ ममता की कड़वाहट की तपिश महसूस की जा रही है। 28 मई को विध्वंसक चक्रवात यास से हुई क्षति पर विमर्श के लिए प्रधानमंत्री की कलाईकुंडा में बुलाई गयी बैठक में ममता गयीं जरूर लेकिन उन्हें चक्रवात से हुई क्षति का आकलन सौंपकर उनसे अनुमति लेकर लौट गयीं। ममता का विरोध इस बात को लेकर था कि इसमें विधानसभा में विपक्ष के नेता तथा नंदीग्राम में उन्हें हराने वाले शुभेंदु अधिकारी को आमंत्रित किया गया था। ममता ने इसे क्षति-आकलन बैठक के बदले राजनीतिक बैठक कहा।

अधिकारी को बुलाया जाना मान्य परंपराओं के खिलाफ था। ऐसी बैठकों में नेता प्रतिपक्ष को बुलाने की कोई परंपरा नहीं है। पिछले साल जब चक्रवात अम्फान पर ऐसी बैठक हुई थी तब तत्कालीन विपक्षी नेता कांग्रेस के अब्दुल मन्नान को नहीं बुलाया गया था। ममता के इस कदम की अमित शाह, राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा ने आलोचना की है। शाह, शुभेंदु ने इसे मोदी का अपमान बताया है लेकिन राज्य भाजपा के कई नेता दबे स्वर कह रहे हैं कि अधिकारी को न बुलाकर इस अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता था। भाजपा इसे भारतीय संघीय ढांचे के खिलाफ मान रही है लेकिन ममता को चिढ़ाने का काम उसने स्वयं किया है। इसके पूर्व भी कोरोना को लेकर मोदी और मुख्यमंत्रियों के बीच हुई आनलाइन बैठक के दौरान विवाद सामने आया था।

ममता ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री ने बैठक में केवल अपनी बात कही, किसी भी मुख्यमंत्री को अपने विचार रखने का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने “असुरक्षित” मोदी पर यह आरोप लगाते हुए कहा था कि एक राष्ट्र, हर तरह का अपमान-तानाशाही के भी बढ़कर, लगता है देश में मार्शल लाॅ लागू है, देश एक संकट के दौर से गुजर रहा है लेकिन प्रधानमंत्री लापरवाह हैं, उन्हें मीडिया में प्रचार की आवश्यकता थी, इसी कारण उन्होंने अपनी बात रखी, दूसरों को बोलने का मौका नहीं दिया। दूसरी ओर, केंद्र ने बंगाल के मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय को केंद्र से सम्बद्ध कर दिया है जो तीन महीने के एक्सटेंशन (वे 31 मई को रिटायर होने वाले थे) पर थे। इसे अभूतपूर्व और बदले की कार्रवाई माना जा रहा है। वे राज्य में कोविड मामलों की निगरानी कर रहे थे। ममता ने यह आदेश वापस लेने की अपील की है और इसे राजनीतिक प्रतिहिंसा कहा है। ममता ने आरोप लगाया कि पिछले 24 दिनों से मुझे काम नहीं करने दिया जा रहा है, हालांकि हमारा सारा ध्यान कोरोना महामारी से निपटने में लगा है। मेरे शपथ ग्रहण के साथ ही राज्यपाल ने कुछ घटनाओं को लेकर बयान जारी किया। ये घटनाएं तब घटी थीं जब के अधीन था। 24 घंटे के अंदर एक केंद्रीय टीम आ गयी, 48 घंटे के अंदर मानवाधिकार आयोग की टीम आ धमकी और 72 घंटे के अंदर महिला आयोग आ गया। इसके बाद कई केंद्रीय मंत्री आये। दरअसल, भाजपा अपनी हार नहीं पचा पा रही है और मुझे परेशानी में डाल रही है।

अलापन का मामला गहरा सकता है क्योंकि प्रशासनिक जानकारों के अनुसार केंद्र के आदेश में कुछ प्रक्रियागत त्रुटियां दिख रही हैं। पूर्व आईपीएस तथा पूर्व केंद्रीय सचिव जवाहर सरकार का कहना है कि पहले भी टकराव होते रहे हैं, कड़वाहट रही है लेकिन इस निम्न स्तर पर गिरावट नहीं देखी गयी। यह दुखद है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके तथा राज्यों को अधिकतम स्वायत्तता के मुखर समर्थक रहे मोदी आज स्वयं भारत के संघीय ढांचे को नष्ट कर रहे हैं। उनका यह कदम ममता और बंगाल के प्रति नया और सुदूरगामी प्रभाव वाला कदम साबित हो सकता है। इसमें प्रक्रियागत खामियां हैं। राज्य सरकार के अनुरोध पर जिस अधिकारी को केंद्र ने कुछ दिन पहले तीन महीने का एक्सटेंशन दिया, अब उसी को उसके रिटायरमेंट के दिन केंद्र से सम्बद्ध कर दिया गया। यह एकतरफा फैसला है। किसी आईपीएस को, जो राज्य सरकार के अधीन है, इस तरह के आदेश नहीं दिये जा सकते। इसके अलावा यह नहीं बताया गया है कि उनकी नियुक्ति किस पद पर हुई है। केंद्र को पता है कि मामला अधर में लटक सकता है और कानूनी आधार पर इसका विरोध हो सकता है। इसी कारण, जैसी कि खबर है, उसने हाई कोर्ट में एक कैविएट याचिका दायर कर रखा है।        

राजनीतिक हिंसा और नारदा कांड: दो मई को नतीजों की घोषणा के बाद से ही राजनीतिक हिंसा का दौर फिर शुरू हुआ और भाजपा और तृणमूल के बीच यह खूनी खेल दो दिनों में ही 22 जानों की बलि ले ली। व्यापक पैमाने पर आगजनी भी हुई। राज्यपाल जगदीप धनखड़ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात की और बंगाल में कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जतायी। हिंसा की घटनाओं पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बंगाल सरकार से रिपोर्ट मांगी। साथ ही, हिंसा और आगजनी का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। भाजपा नेता गौतम भाटिया ने अदालत में याचिका दायर कर हिंसा की सीबीआई जांच की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि बंगाल में महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया है। भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले किये गये और मार डाला गया। लिहाजा, सीबीआई को हिंसा की जांच करनी चाहिए।
मुख्यमंत्री बनर्जी ने हिंसा की लगातार आ रही खबरों के बीच सार्वजनिक रूप से सभी से शांति बनाए रखने की अपील की और किसी प्रकार के उकसावे से बचने तथा पुलिस को सूचना देने को कहा। बंगाल में राजनीतिक हिंसा की घटनाएं नयी नहीं है लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि सभी राजनीतिक दल इन हिंसक घटनाओं, आगजनी, बलात्कार, भय से पलायन या घर छोड़ने के लिए बाध्य करने आदि की घटनाओं के लिए एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप झोंकते रहते हैं लेकिन कोई मिलकर इसका समाधान ढूंढने की दिशा में कोई पहल नहीं करता। धनखड़ हिंसा के कारण पलायन कर गये लोगों से मिलने पहुंच गये।
ममता को राज्यपाल की अति सक्रियता अखर गयी। उन्होंने धनखड़ को राज्यपाल के पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। पत्र यह बताने को काफी है कि राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच विवाद किस हद तक गहरा गया है। राज्यपाल के साथ रिश्तों में खटास का एक और मुख्य मुद्दा है नारदा मामला। इस कांड में गिरफ्तार पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी, परिवहन मंत्री फिरहाद हाकिम, तृणमूल विधायक मदन मित्रा तथा पूर्व मेयर शोभन चटर्जी को कलकत्ता हाई कोर्ट ने 28 मई को अंतरिम जमानत दे दी। इन चारों अभियुक्तों को 17 मई को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी की खबर पाते ही ममता सदल बल सीबीआई कार्यालय पहुंच गयीं। सीबीआई अदालत ने अभियुक्तों को जमानत दे दी, जिसके खिलाफ सीबीआई ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां जमानत रद्द कर दी गयी लेकिन दो जजों के पीठ में मतभेद रहा और इस पर विचार करने के लिए पांच जजों के पीठ का गठन किया गया। सीबीआई ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जहां इसकी याचिका पर कोर्ट ने प्रतिकूल टिप्पणी की और कहा कि जमानत याचिका या तो स्वीकार की जाती है या रद्द। पहली बार जमानत पर दो जजों में मतभेद दिखा। सीबीआई को हाई कोर्ट जाने की क्या जल्दबाजी थी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियुक्तों के दो सेट हैं, एक तो वह जिनके खिलाफ चार्जशीट तैयार हुआ है और गिरफ्तारी हुई है, दूसरा वह जो अभियुक्त गिरफ्तार नहीं हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि तृणमूल से भाजपा में गये मुकुल राय और शुभेंदु अधिकारी भी इस मामले में अभियुक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इनका नाम नहीं लिया। सीबीआई ने याचिका वापस ले ली। हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब सीबीआई के वकील ने कहा कि अभियुक्त प्रभावशाली हैं तथा साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं तब अदालत ने कहा कि मामला 2017 में शुरू हुआ, उस समय भी ये उतने ही प्रभावशाली थे, तब आपने उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया। इन चारों की गिरफ्तारी की अनुमति राज्यपाल ने दी थी जिसका स्पीकर ने विरोध किया था कि यह काम स्पीकर का है क्योंकि तब तक विधानसभा गठित हो चुकी थी। स्पष्ट है कि धनखड़ और ममता के बीच टकराहट थमने वाली नहीं है।
विवाद का एक कारण यह भी हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर ममता की महती भूमिका की जो सुगबुगाहट है, उसे पनपने से पहले ही समाप्त कर दिया जाये। ममता को उनके घर तक सीमित कर दिया जाये, आकाश की ओर देखने का मौका ही नहीं दिया जाये। भाजपा के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी आने वाली है। अगले साल गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने वाले हैं। भाजपा के कई पुराने सहयोगी साथ छोड़ चुके हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा को अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़नी होगी। बंगाल में पराजय का ही असर है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने में लगभग एक साल का समय है लेकिन अभी से उस पर मंथन शुरू हो गया है और विपक्ष भाजपा से दो कदम आगे खड़ा दिख रहा है। भाजपा के सामने कठिन लड़ाई है क्योंकि उसके अपराजेय होने का मिथक टूट चुका है और बंगाल की छाया उसे डरा रही है।
बंगाल तथा केंद्र की लड़ाई दोनों ही पक्षों के लिए अहितकर है। इसे स्थायी न बनाया जाये। दोनों पक्षों ने तोड़े हैं मर्यादा के तटबंध, सोच में, लहजे में, भाषा में शिष्टता सिसकी है, न्यूनाधिक दोनों ही दोषी हैं। पर हर चीज की सीमा होती है, दोनों पक्ष यदि संवाद के माध्यम से, सद्भावना से इसे यहीं समाप्त कर आगे की सुध लें तो यह देशहित में होगा।

केंद्र और राज्य सरकारों में तल्खी दशकों पुरानी

केंद्र और राज्य सरकारों में तनावपूर्ण संबंधों का इतिहास दशकों पुराना है। इसकी शुरुआत 1967 में हुई जब कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल, संयुक्त मोर्चे तथा साम्यवादी सरकारें गठित हुईं। 1968 में पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी की सरकार ने ऐसी स्थिति पैदा की कि केंद्र को राज्यपाल धर्मवीर को वापस बुलाना पड़ा लेकिन 1971 में कांग्रेस फिर से इन राज्यों में काबिज हो गयी। परिस्थितियां 1977 के आम चुनाव में बदलीं जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार आयी लेकिन कई राज्यों में कांग्रेस सत्तासीन थी और समस्या शुरू हुई। केंद्र सरकार ने इस आधार पर कांग्रेस शासित नौ राज्यों की सरकारों को भंग करने का निर्णय किया कि ये सरकारें जनता का विश्वास गंवा चुकी हैं। और चुनाव जनता पार्टी जीत गयी। संबंधों में तनाव के अवसर ही समाप्त हो गये लेकिन 1980 के आम चुनाव में जनता पार्टी पराजित हो गयी और कांग्रेस (आई) की सरकार केंद्र में आयी इतिहास दोहराया गया केंद्र सरकार ने जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलों शासित नौ राज्यों की विधानसभाओं को भंग कर दिया।
इन नौ राज्यों के चुनाव में आठ में कांग्रेस (आई) विजयी रही और संबंधों में तनाव की आशंका समाप्त हो गयी लेकिन फिर शुरू हुआ तनावों का नया दौर। 1984 के आम चुनाव में केंद्र में तो कांग्रेस (आई) विशाल बहुमत से सत्ता में वापस आयी लेकिन राज्यों में बुरी तरह पराजित हुई। इस बीच, देश में 1969 में सुदूरगामी परिणाम वाले दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हुए। कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गयी। एक का नेतृत्व इंदिरा गांधी तथा दूसरे का नेतृत्व तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा कर रहे थे। 1971 में मध्यावधि चुनाव हुए और इंदिरा गांधी को दो तिहाई बहुमत मिला। उस समय सात राज्यों में संयुक्त मोर्चा या संयुक्त विधायक दल (संविद) सरकारें थीं। फिर शुरू हुआ भारतीय लोकतंत्र का वह कलंकित दौर जिसे आया राम गया राम दौर कहा जाता है। सुबह एक दल में तो शाम को किसी दूसरे खेमे में।
जनता को राजनेताओं का यह गिरगिटिया रंग नहीं भाया। 1972 में कई राज्यों में चुनाव हुए और इंदिरा की पार्टी कांग्रेस (आई) अधिसंख्य बड़े राज्यों में जीत गयी। इस प्रकार देश में एक बार पुनः एकदलीय शासन शुरू हुआ और केंद्र-राज्य संबंधों में कोई संकट नहीं दिखा। 1975 में भारतीय लोकतंत्र का कलंकित दिन आया जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। सारे प्रतिबंधों तथा अत्याचारों के बावजूद देश में इसका प्रचंड विरोध हुआ और इंदिरा केवल 19 महीने तक ही सत्ता में रह पायीं। 1977 में आम चुनाव हुए और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार, जनता पार्टी की सरकार ने विशाल जनादेश के साथ शासन संभाला। यहीं से केंद्र-राज्यों के संबंधों में तनातनी शुरू हुई। उस समय कई राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी। इनमें से कई ने अपना सामान्य कार्यकाल पूरा कर लिया था लेकिन 42वें संविधान संशोधन के बूते सत्ता में थे। इसमें विधानसभाओं के कार्यकाल को पांच से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया था। केंद्र तथा राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारों के बीच संभावित तल्खी को देखते हुए तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री चैधरी चरण सिंह ने इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा कि वे अपने राज्यपालों को विधानसभा भंग करने की सिफारिश करें।
कांग्रेसी सरकारों ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया लेकिन अदालत ने कह दिया कि केंद्र को ऐसा करने का अधिकार है। केंद्र ने कांग्रेस शासित नौ विधानसभाओं को भंग कर दिया। चुनाव हुए, जनता पार्टी जीती लेकिन फिर भी कुछ ऐसे राज्य थे जहां गैर जनता पार्टी की सरकार थी लेकिन जनता पार्टी ने उस ओर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि अधिसंख्य राज्यों में या तो जनता पार्टी की सरकार थी या अन्य दलों के सहयोग से वह शासन कर रही थी। इन घटनाओं के बावजूद केंद्र और राज्यों के संबंधों में बहुत गंभीर समस्याएं पैदा नहीं हुईं। उधर, जनता पार्टी में अंतरकलह लगातार गहराता जा रहा था जिसकी चरम परिणति 1979 में दिखी जब विपक्ष के नेता वाई बी चह्वाण ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया और बमुश्किल ढाई साल सत्ता में रहने के बाद जनता पार्टी सरकार अपने ही बोझ तले ढह गयी।
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस (आई) के समर्थन से चैधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने लेकिन यह गठबंधन चंद दिनों तक ही चला। जब लोकसभा का सत्र आहूत हुआ तब कांग्रेस (आई) ने समर्थन वापस ले लिया और संसद का सामना किए बिना ही चरण सिंह की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। लोकसभा भंग कर दी गयी और 1979 में आम चुनाव हुए। कांग्रेस (आई) चुनाव जीत गयी और इतिहास एक बार फिर दोहराया गया। गैर कांग्रेस शासित नौ राज्यों की विधानसभाओं को भंग कर चुनाव कराये गये जिनमें से आठ में कांग्रेस (आई) जीत गयी। केवल तमिलनाडु में अखिल भारतीय अद्रमुक सत्ता में वापस आने में कामयाब रही।
संबंधों में सुधार के सुझावः   1970 में तमिलनाडु ने केंद्र तथा राज्यों के संबंधों में सुधार के लिए पीवी राजामन्नार के नेतृत्व में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जिसके सुझावों में अंतरराज्यीय परिषद का गठन, योजना आयोग को स्वायत्तशासी बनाया जाना, राज्यों की केंद्र पर आर्थिक निर्भरता कम करना, कुछ विषयों को केंद्र की सूची से हटाकर राज्यों को स्थानांतरित किया जाना, अंग्रेजी को संपर्क भाषा बनाना प्रमुख थे लेकिन केंद्र ने किसी सुझाव को मानने से इनकार कर दिया। तमिलनाडु के बाद 1977 में वाम मोर्चे की पश्चिम बंगाल सरकार ने एक ज्ञापन तैयार किया। इसमें आरोप लगाया गया कि पिछले एक दशक से गैर कांग्रेसी राज्यों पर भारी दबाव है तथा उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। राज्य सरकारों को केंद्र सरकार का एक विभाग बना दिया गया है। इसमें मांग की गयी कि राज्यों को उनकी अपनी गतिविधियों की स्वतंत्रता दी जाये, केंद्र सुरक्षा, विदेशी मामले, विदेश व्यापार आदि अपने पास रखे, केंद्र और राज्यों के अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या हो, राजस्व का 75 प्रतिशत राज्यों को दिया जाये, योजना आयोग राज्यों को देय राशि का निर्धारण न करे, राज्यसभा में सभी राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व मिले, जल-विवादों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट करे आदि।
उधर, पंजाब में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित कर राज्य को स्वायत्तता, राज्यों को अधिकतम अधिकारों की मांग की। केंद्र ने इन मांगों को मानने से इनकार कर दिया। इसी बीच, राष्ट्रपति संजीव रेड्डी ने 1981 में विचार व्यक्त किया कि राज्यों को अधिक अधिकार और संसाधन दिये जाने चाहिए, केंद्र में प्रशासनिक मशीनरी किसी भी रूप में राज्यों से अधिक प्रभावशाली नहीं है। स्पष्टतः विपक्ष ने इसका स्वागत और कांग्रेस ने विरोध किया। अंततः केंद्र-राज्य संबंधों तथा अन्य सम्बद्ध पहलुओं पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त जज जस्टिस एस आर सरकारिया की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया। सरकारिया आयोग की कुछ अनुशंसाएं लागू की गयीं लेकिन राज्य आज भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र से टकराते रहते हैं और कई बार तो इस पद को ही समाप्त कर देने की मांग उठ चुकी है।
जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है, यहां केंद्र से टकराव अकसर होता रहा है क्योंकि 1977 के बाद से यहां विपक्ष की सरकार रही है। 1977 के बाद वाम मोर्चे का शासन रहा और अब तृणमूल का है। इस दौरान केंद्र में कांग्रेस, जनता पार्टी और भाजपा की सत्ता रही। राज्य में राज्यपाल के साथ सरकार का टकराव पहली बार तब शुरू हुआ जब नवंबर 1967 में राज्यपाल धर्मवीर ने अजय मुखर्जी की संयुक्त मोर्चा सरकार को बर्खास्त कर दिया था। वर्ष 1969 में फिर संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी, राज्य सरकार ने धर्मवीर को पद से हटाने की मांग की जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मान लिया। नये राज्यपाल शांति स्वरूप धवन के बीच टकराव वर्ष 1971 में हुआ जब विधानसभा चुनाव में वामदलों के 113 सीटें जीतने के बावजूद धवन ने 105 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया। कांग्रेस का शासन पांच साल तक चला। विवाद का सवाल ही नहीं था। 1977 में वाममोर्चा को प्रचंड बहुमत मिला। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र की मित्र सरकार ने वाम दलों के अनुरोध पर राज्यपाल के रूप में त्रिभुवन नारायण सिंह को भेजा। कभी कोई टकराव नहीं हुआ। समस्या की शुरुआत तब हुई जब 1980 में केंद्र में फिर से सत्तासीन इंदिरा गांधी ने भैरव दत्त पांडेय को राज्यपाल बनाकर भेजा। उनके साथ वाम सरकार का हमेशा किसी न किसी मुद्दे पर टकराव होता रहा और वामपंथी उन्हें बंग दमन पांडेय के नाम से पुकारते लगे। 1984 में राज्यपाल बने अनंत प्रसाद शर्मा के साथ भी विवाद जारी रहा। देश के पूर्व खुफिया प्रमुख टीवी राजेश्वर 1990 में राज्यपाल बने। वामपंथियों ने कहना शुरू किया कि हमारी जासूसी के लिए उन्हें भेजा गया है। अगले राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी के साथ विवाद तब शुरू हुआ जब उन्होंने नंदीग्राम की घटना की निंदा की।
2011 में ममता ने वाम मोर्चा को बेदखल कर दिया। तब राज्यपाल एमके नारायणन थे। 2014 में केसरीनाथ त्रिपाठी आये। इनके साथ भी ममता की नहीं पटी लेकिन विवाद चरम पर पहुंचा 2019 में, जब जगदीप धनखड़ आये। दोनों के बीच विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है और राज्यपाल के पद से उन्हें हटाने की मांग ममता कर चुकी हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.